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History of Jainism – Origins and Evolution | जैन धर्म का इतिहास

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Introduction | जैन धर्म का इतिहास क्यों महत्त्वपूर्ण है?

इतिहास की दृष्टि से देखें तो जैन धर्म (Jainism) का इतिहास वर्तमान में दिखाई देने वाली इस पृथ्वी से भी अत्यंत प्राचीन माना गया है। जैन शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि अनादि–अनंत है और उसी प्रकार जैन धर्म भी अनादि–अनिधन (Eternal and Timeless Philosophy) है।

वर्तमान में हमें जो पृथ्वी दिखाई देती है, वह जैन आगमिक परंपरा के अनुसार भरत क्षेत्र के छह खण्डों में से केवल एक आर्य खण्ड है, जो प्रत्येक अवसर्पिणी काल के अंत में प्रलय को प्राप्त होता है, जबकि जैन धर्म कालातीत सत्य के रूप में बना रहता है।

फिर भी, वर्तमान अवसर्पिणी काल में जैन धर्म का प्रवर्तन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) द्वारा हुआ—इस विषय पर जैन, वैदिक, बौद्ध तथा आधुनिक इतिहासकारों के क्या मत हैं, इसे समझना आवश्यक है।


जैन धर्म की प्राचीनता: पुरातात्त्विक प्रमाण (Archaeological Evidence)

पुरातत्त्व की दृष्टि से जैन धर्म की प्राचीनता को अनेक विद्वानों ने स्वीकार किया है। प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. राखलदास बनर्जी द्वारा किए गए सिन्धु घाटी सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त मोहरों में जैन परंपरा से संबंधित संकेत मिलते हैं।

सिन्धु घाटी से प्राप्त सील संख्या 449 के लेख को प्रो. प्राणनाथ विद्यालंकार ने “जिनेश्वर” के रूप में पढ़ा है। पुरातत्त्वज्ञ रायबहादुर चन्द्रा के अनुसार, कुछ मूर्तियों में तीर्थंकर ऋषभदेव की खड्गासन मुद्रा के समान वैराग्य और ध्यान के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

विशेष रूप से, सोल क्र. द्वितीय एफ.जी.एच. की मूर्ति में वैराग्य मुद्रा के साथ नीचे वृषभ (बैल) का चिह्न भी अंकित है, जो ऋषभदेव का पारंपरिक लांछन माना जाता है। इन तथ्यों के आधार पर अनेक विद्वानों ने जैन धर्म को सिन्धु घाटी सभ्यता (लगभग 5000 वर्ष प्राचीन) से संबद्ध माना है।

हड़प्पा से प्राप्त नग्न मानव धड़ पर केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग के महानिदेशक टी. एन. रामचन्द्रन ने गहन अध्ययन के पश्चात इसे कायोत्सर्ग मुद्रा में स्थित दिगम्बर जैन प्रतिमा माना है।


मथुरा और जैन पुरातत्त्व

उत्तर भारत में मथुरा का कंकाली टीला जैन पुरातत्त्व की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से प्राप्त:

  • एक प्राचीन जैन स्तूप
  • 110 से अधिक शिलालेख
  • सैकड़ों जैन प्रतिमाएँ

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक की जैन परंपरा की निरंतरता को सिद्ध करती हैं। डॉ. विन्सेन्ट ए. स्मिथ के अनुसार, मथुरा के अन्वेषणों से यह स्पष्ट होता है कि ऋषभदेव सहित 24 तीर्थंकरों की मान्यता अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित थी


वैदिक एवं पुराण साहित्य में जैन धर्म

वैष्णव, वैदिक और पुराण साहित्य में भी जैन धर्म की प्राचीनता के अनेक उल्लेख मिलते हैं। शिवपुराण, महाभारत, ऋग्वेद और यजुर्वेद में ऋषभदेव, नेमिनाथ और वर्धमान महावीर का उल्लेख मिलता है।

इन ग्रंथों में:

  • ऋषभदेव को तपस्वी, वीतराग और अरिहंत रूप में
  • नेमिनाथ को गिरनार पर्वत से
  • दिगम्बर मुनियों को विजयी और पूज्य रूप में

स्वीकार किया गया है। यह दर्शाता है कि जैन परंपरा वैदिक काल से स्वतंत्र और समानांतर रूप से विकसित होती रही।


बौद्ध साहित्य में जैन धर्म के उल्लेख

बौद्ध ग्रंथों में भी जैन धर्म के स्पष्ट संदर्भ उपलब्ध हैं:

  • महावग्ग में वैशाली में दिगम्बर साधुओं के प्रवचन का उल्लेख
  • अंगुत्तर निकाय में महावीर को सर्वज्ञ बताया गया है
  • मज्झिम निकाय और दीर्घ निकाय में महावीर को पूज्य तीर्थंकर स्वीकार किया गया है

ये उल्लेख यह सिद्ध करते हैं कि जैन धर्म बुद्ध से भी पूर्ववर्ती और समकालीन परंपरा था।


आगमिक प्रमाण और ऐतिहासिक राजाश्रय

जैन आगमों के अनुसार मगध के राजा बिंबसार (श्रेणिक) और अजातशत्रु (कूणिक) जैन धर्म के अनुयायी थे। महावीर स्वामी के समवसरण में उनके आगमन का उल्लेख आगम साहित्य में मिलता है।

नंद, मौर्य, गुप्त और अन्य राजवंशों के काल में जैन धर्म को निरंतर राजाश्रय प्राप्त हुआ। दिगम्बर परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने आचार्य भद्रबाहु से दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला में संलेखना द्वारा देह-त्याग किया।


खारवेल से कुमारपाल तक: राजनीतिक संरक्षण

कलिंग के सम्राट खारवेल ने ऋषभदेव की प्रतिमा की स्थापना कराई और जैन साधुओं के लिए गुफाएँ खुदवाईं। गुजरात में राजा सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल के शासनकाल में आचार्य हेमचंद्र के प्रभाव से जैन धर्म को स्वर्णयुग प्राप्त हुआ।

इसी काल में:

  • शत्रुंजय
  • गिरनार
  • आबू पर्वत

पर भव्य जैन मंदिरों का निर्माण हुआ और अहिंसा आधारित शासन की स्थापना का प्रयास किया गया।


दक्षिण भारत में जैन धर्म का विस्तार

दक्षिण भारत विशेषकर कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में जैन धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। गंग, राष्ट्रकूट और कदंब वंशों के संरक्षण में दिगम्बर जैन परंपरा फली-फूली।

सन् 980 ई. में चामुंडराय द्वारा श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली (गोम्मटेश्वर) की विशाल प्रतिमा का निर्माण इस परंपरा का अद्वितीय उदाहरण है।


मध्यकाल और मुगल काल में जैन धर्म

मध्यकाल में भी जैन धर्म की परंपरा अक्षुण्ण रही। मुगल शासकों—विशेषकर अकबर—ने जैन मुनियों को सम्मान दिया। अकबर ने आचार्य हरिविजयसूरि के प्रभाव से जीव हिंसा पर प्रतिबंध लगाया।

औरंगज़ेब, अहमदशाह बहादुर और अन्य शासकों द्वारा भी जैन तीर्थों को संरक्षण प्रदान किया गया।


आधुनिक विद्वानों के मत (Scholarly Opinions)

आधुनिक इतिहासकारों और विद्वानों ने भी जैन धर्म की प्राचीनता स्वीकार की है:

  • डॉ. जैकोबी ने ऋषभदेव को अत्यंत प्राचीन माना
  • डॉ. राधाकृष्णन ने ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में ऋषभदेव पूजा का उल्लेख किया
  • लोकमान्य तिलक ने अहिंसा के प्रभाव को जैन धर्म की देन बताया
  • प्रो. हाजिमे नाकामुरा ने जापान और चीन में ऋषभदेव के उल्लेख की पुष्टि की

जैन दर्शन को और गहराई से समझें (Related Jainism Articles)

जैन धर्म के इतिहास को समझने के साथ-साथ यदि आप उसके दर्शन, ब्रह्मांडीय दृष्टि और साधना-पद्धति को जानना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लेख उपयोगी सिद्ध होंगे:

clusion | निष्कर्ष

जैन धर्म का इतिहास केवल किसी संप्रदाय की कहानी नहीं, बल्कि अहिंसा, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना की सतत यात्रा है। वैदिक, बौद्ध, आगमिक और आधुनिक ऐतिहासिक स्रोत—सभी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जैन धर्म मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और जीवंत परंपराओं में से एक है, जो आज भी उतनी ही relevant और rational है जितनी सहस्रों वर्ष पूर्व थी।

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