Nature of the Universe in Jainism (जैन धर्म में ब्रह्मांड)
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Introduction | जैन धर्म में ब्रह्मांड की अवधारणा
ब्रह्मांड (Universe) को लेकर मानव के मन में सदैव कुछ मूल प्रश्न रहे हैं – ब्रह्मांड क्या है? यह कब से है? किसने बनाया? क्या इसका अंत होगा?
अधिकांश धार्मिक परंपराएँ ब्रह्मांड को ईश्वर द्वारा निर्मित मानती हैं, वहीं जैन धर्म (Jainism) एक बिल्कुल अलग और तार्किक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। जैन दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड अनादि–अनंत (Eternal) है, अर्थात न तो इसका कोई प्रारंभ है और न ही कोई अंत। यह किसी ईश्वर द्वारा बनाया या नष्ट नहीं किया गया है।
ब्रह्मांड को लेकर जैन दृष्टिकोण (Jain View of the Universe)
जैन शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड:
- अनादि (Without beginning) है।
- अनिधन (Without end) है।
- अकृत्रिम (Not created by anyone) है।
- स्वतः नियमों (Natural laws) से संचालित है।
जैन दर्शन किसी Creator God की अवधारणा को स्वीकार नहीं करता, बल्कि मानता है कि ब्रह्मांड अपने स्वभाव (Nature) से संचालित होता है।
अन्य धार्मिक मान्यताओं की संक्षिप्त समीक्षा (Comparative Perspective)
दुनिया के कई धर्म ब्रह्मांड की उत्पत्ति को ईश्वर से जोड़ते हैं –
- Islam & Christianity: ईश्वर ने कुछ दिनों में सृष्टि बनाई।
- Sikhism: परमात्मा द्वारा सृष्टि की रचना।
- Hindu Traditions: ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा सृजन, पालन और संहार।
जैन दर्शन इन मान्यताओं पर प्रश्न उठाता है:
- यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो उसे समय क्यों लगा?
- सुख‑दुख, ऊँच‑नीच, असमानता का उत्तरदायित्व किसका है?
- यदि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से है तो कर्म‑फल का सिद्धांत कैसे न्यायपूर्ण है?
इन प्रश्नों के कारण जैन धर्म Self‑responsibility और Karma‑based universe को अधिक तर्कसंगत मानता है।
विज्ञान और ब्रह्मांड (Universe According to Science)
आधुनिक विज्ञान ने भी ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर कई सिद्धांत दिए हैं:
Big Bang Theory
इसके अनुसार अरबों वर्ष पहले एक अत्यंत सघन बिंदु से ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। लेकिन वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस प्रारंभिक स्थिति के पहले क्या था – इसका उत्तर विज्ञान के पास अभी नहीं है।
Steady State Theory
यह सिद्धांत मानता है कि ब्रह्मांड न तो उत्पन्न हुआ और न नष्ट होता है – यह सदैव अस्तित्व में रहा है।
👉 यह सिद्धांत जैन शास्त्रों की अनादि‑अनंत ब्रह्मांड की अवधारणा से काफ़ी मेल खाता है।
जैन धर्म में ब्रह्मांड की रचना (Universe According to Jainism)
जैन धर्म के अनुसार ब्रह्मांड छह शाश्वत द्रव्यों (Six Eternal Substances) से बना है:
- जीव (Soul)
- पुद्गल (Matter)
- धर्म (Medium of Motion)
- अधर्म (Medium of Rest)
- आकाश (Space)
- काल (Time)
ये सभी द्रव्य स्वतंत्र, शाश्वत और अविनाशी हैं।
द्रव्य क्या है? (What is Dravya?)
जो गुण (qualities) और पर्याय (modes) से युक्त हो और जो भूत‑वर्तमान‑भविष्य तीनों कालों में बना रहे, उसे द्रव्य कहते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि पदार्थ न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न नष्ट – यह जैन दर्शन के द्रव्य सिद्धांत से मेल खाता है।
छह द्रव्यों का सरल परिचय (Six Substances Explained Simply)
1. जीव द्रव्य (Jiva – Soul)
जिसमें चेतना, ज्ञान और दर्शन हो – वही जीव है। आत्मा शरीर से अलग एक स्वतंत्र reality है, जो जन्म‑मरण के चक्र में कर्मों के कारण भ्रमण करती है।
2. पुद्गल द्रव्य (Pudgala – Matter)
जिसमें रूप, रस, गंध और स्पर्श हों – वह पुद्गल है। आधुनिक भाषा में इसे Matter & Energy कहा जा सकता है। परमाणु इसकी सबसे छोटी इकाई है।
3. धर्म द्रव्य (Medium of Motion)
यह गति में सहायक तत्व है। जैसे जल मछली को तैरने में सहायता करता है, वैसे ही धर्म द्रव्य जीव और पुद्गल को चलने में सहायक होता है।
4. अधर्म द्रव्य (Medium of Rest)
यह रुकने में सहायक तत्व है। जैसे वृक्ष छाया देकर राहगीर को विश्राम देता है।
5. आकाश द्रव्य (Space)
जो सभी द्रव्यों को स्थान देता है। जैन दर्शन में लोकाकाश और अलोकाकाश का स्पष्ट विभाजन है।
6. काल द्रव्य (Time)
जो परिवर्तन (change) में सहायक होता है। यह स्वयं कुछ नहीं करता, पर इसके बिना कोई परिवर्तन संभव नहीं।
जैन ब्रह्मांड और आधुनिक relevance
आज जब विज्ञान भी Eternal universe, conservation of matter और law of causation की बात करता है, तब जैन धर्म का ब्रह्मांड सिद्धांत और अधिक relevant हो जाता है।
- No creator‑god theory
- Law of karma
- Self‑responsibility
- Logical cosmology
ये सभी concepts modern thinkers को आकर्षित करते हैं।
जैन दर्शन को और गहराई से समझें (Related Jainism Articles)
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आत्मा से परमात्मा बनने की प्रक्रिया और ईश्वर की जैन अवधारणा। - 👉 History of Jainism – Origins and Evolution (जैन धर्म का इतिहास)
जैन धर्म की प्राचीन उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास। - 👉 Key Principles of Jainism (जैन सिद्धांत)
अहिंसा, अनेकान्तवाद और कर्म सिद्धांत की व्याख्या।
Conclusion | निष्कर्ष
जैन धर्म में ब्रह्मांड कोई चमत्कार नहीं बल्कि एक स्वाभाविक, नियमबद्ध और न्यायपूर्ण व्यवस्था है। यहाँ न कोई रचयिता है, न संहारक – केवल शाश्वत द्रव्य, कर्म और परिणमन हैं।
यही कारण है कि जैन दर्शन न केवल आध्यात्मिक बल्कि scientific और rational worldview भी प्रस्तुत करता है।