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Life and Form of Jain Monks (जैन साधु का जीवन और स्वरुप)

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Introduction | जैन मुनिराज की चर्या को समझना क्यों ज़रूरी है?

जैन धर्म (Jainism) में मुनिराज का जीवन केवल त्याग का नहीं, बल्कि आत्मा को परम शुद्ध अवस्था तक पहुँचाने की वैज्ञानिक साधना का मार्ग है। जैन मुनिराज की चर्या (daily conduct & discipline) इतनी गहन और कठोर होती है कि उसे समझे बिना जैन दर्शन की वास्तविक गहराई को समझना संभव नहीं है।

यह लेख जैन मुनिराज के जीवन, उनके नियमों, तपस्या, आहारचर्या और संयम को detail, clarity और reader-interest के साथ प्रस्तुत करता है, ताकि पाठक यह समझ सके कि जैन साधना केवल कहने का नहीं बल्कि जीने और सहने का धर्म है।


जैन धर्म में साधु का स्वरूप

जैन धर्म में संन्यास ग्रहण करने वाले पुरुष साधकों को मुनि, निर्ग्रन्थ, श्रमण और दिगम्बर मुनि कहा जाता है।

दिगम्बर का अर्थ है – दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हों। दिगम्बर मुनि नग्न रहते हैं और केवल तीन वस्तुएँ रखते हैं:

  • कमंडल
  • मयूर पिच्छी
  • शास्त्र

स्त्री संन्यासियों को आर्यिका कहा जाता है। आर्यिका माँ एक सफेद साड़ी पहना करती हैं। 


जैन दिगम्बर मुनि कैसे बनते हैं?

जैन धर्म में दीक्षा का अर्थ है — संसार, भोग और शरीर के प्रति पूर्ण विरक्ति। दीक्षा लेने वाला साधक स्वेच्छा से सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग करता है और आत्मकल्याण के मार्ग पर प्रवेश करता है।

दीक्षा के पश्चात मुनि का जीवन पूर्णतः नियमबद्ध, संयमित और आत्मकेन्द्रित हो जाता है।


जैन मुनि का दैनिक जीवन (Daily Life of Jain Monks)

जैन मुनिराज का जीवन अत्यंत कठोर होता है:

  • किसी भी मौसम में पदविहार
  • दिन में एक बार आहार
  • खड़े होकर भोजन
  • आजीवन ब्रह्मचर्य
  • निरंतर आत्मसंयम

इन मूलगुणों में एक प्रमुख गुण है — केशलोच, जो अत्यंत कठिन तपस्या मानी जाती है।


28 मूल गुण (28 Mool Gunas of Digambara Monks)

प्रत्येक दिगम्बर जैन मुनि के लिए 28 मूल गुणों का पालन अनिवार्य है। इन्हें मुख्य रूप से चार वर्गों में समझा जा सकता है:

(A) पंच महाव्रत

  1. अहिंसा – मन, वचन, काय से किसी भी जीव को पीड़ा न देना
  2. सत्य – हित, मित और प्रिय वचन बोलना
  3. अस्तेय – जो न दिया जाए उसे ग्रहण न करना
  4. ब्रह्मचर्य – मैथुन कर्म का पूर्ण त्याग
  5. अपरिग्रह – किसी भी प्रकार के परिग्रह का पूर्ण त्याग

(B) पाँच समितियाँ (Careful Conduct)

  • ईर्या समिति – सावधानीपूर्वक चलना
  • भाषा समिति – दोषयुक्त भाषा का त्याग
  • एषणासमिति – निर्दोष आहार ग्रहण करना
  • आदान-निक्षेप – उपकरण उठाने-रखने में सावधानी
  • प्रतिष्ठापन – निर्जन्तुक स्थान का उपयोग

(C) पाँच इन्द्रिय निग्रह

पाँचों इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण

(D) छः आवश्यक क्रियाएँ

  • सामायिक
  • स्तुति
  • वंदन
  • प्रतिक्रमण
  • प्रत्याख्यान
  • कायोत्सर्ग

(E) अन्य सात नियम

इनमें अस्नान, भूशयन, एकभुक्ति (24 घंटों में एक बार आहार करना), स्थिति भोजन (एक स्थान पर खड़े होकर आहार करना),  केशलोच (अपने हाथों से सिर-दाढ़ी-मूछों के बाल निकालना), नग्नता, अदंतधावन (मंजन कर दांतों को नहीं चमकाना) सम्मिलित हैं।


22 परिषह (Hardships Endured with Equanimity)

जैन मुनि 22 प्रकार के परिषह समभाव से सहन करते हैं, जैसे:

  • भूख और प्यास की बाधा। 
  • शीत और उष्ण की बाधा। 
  • कीट-दंश (मच्छर आदि का काटना)। 
  • अपमान और उपेक्षा। 
  • रोग और वेदना। 

इनका उद्देश्य शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को दृढ़ बनाना है।


12 तप (Austerities for Karma Shedding)

कर्म निर्जरा के लिए जैन मुनि 12 प्रकार के तप धारण करते हैं:

बाह्य तप

  • अनशन
  • अवमौदर्य
  • वृत्ति परिसंख्यान
  • रस परित्याग
  • विविक्त शय्यासन
  • कायक्लेश

आंतरिक तप

  • प्रायश्चित
  • विनय
  • वैयावृत्य
  • स्वाध्याय
  • व्युत्सर्ग
  • ध्यान

जैन साधुओं के पर्यायवाची नाम

श्रमण, संयत, वीतराग, ऋषि, मुनि, साधु और अनगार — ये सभी नाम जैन साधु के विभिन्न गुणों को दर्शाते हैं।


जैन साधुओं के पद

  • आचार्य – संघ के प्रमुख
  • उपाध्याय – शिक्षा देने वाले
  • मुनि – 28 मूल गुणधारी
  • आर्यिका – स्त्री साध्वी
  • ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका – श्रेणीबद्ध संयमी श्रावक-श्राविकाएँ

जैन मुनि स्नान क्यों नहीं करते?

अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धांत है। जल में भी असंख्य जीव होते हैं, इसलिए जैन मुनि जल-स्नान नहीं करते। इसके अतिरिक्त, शरीर की शुद्धि से अधिक आत्मा की शुद्धि को महत्व दिया गया है।


केशलोच: सहनशीलता की चरम साधना

केशलोच का अर्थ है — अपने हाथों से सिर, मूंछ और दाढ़ी के बाल उखाड़ना। यह साधना शरीर-सौंदर्य की आसक्ति को समाप्त करती है और कर्म निर्जरा में सहायक होती है।


जैन मुनि आहार कैसे करते हैं?

जैन मुनि दिन में केवल एक बार, खड़े होकर, अंजुली में आहार ग्रहण करते हैं। यह आहार स्वाद के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए होता है। इसे सिंहवृत्ति कहा जाता है।


जैन मुनि चातुर्मास क्यों करते हैं?

वर्षा ऋतु में जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है। अहिंसा की रक्षा के लिए जैन मुनि चार महीने एक स्थान पर निवास करते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है।


जैन दर्शन को और गहराई से समझें (Related Jainism Articles)

जैन मुनिराज की चर्या को समझने के बाद यदि आप जैन दर्शन को समग्र रूप से जानना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लेख अवश्य पढ़ें:


Conclusion | निष्कर्ष

जैन मुनिराज का जीवन त्याग का नहीं, बल्कि आत्म-विजय का महाव्रत है। उनकी चर्या यह सिखाती है कि आत्मा की शुद्धि के लिए बाह्य सुखों का त्याग और आंतरिक दृढ़ता अनिवार्य है। यही कारण है कि जैन मुनिराज का जीवन आज भी आध्यात्मिक साधना का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है।

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