bhavlingisant.com

Author name: Amritesh

आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की पूजा

Poojan 1. लेखक:- प. पूज्य श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी (संघस्थ) – मुख्य पूजन 2. लेखक:- प. पूज्य श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी (संघस्थ) 3. लेखक:- प. पूज्य श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी (संघस्थ) 4. लेखक- प. विवेक जैन_संकेत (बुंदेली पूजा) 5. लेखक:- सुभाष सिंघई, जतारा (बुंदेली पूजा) 6. भावी अरिहंत श्री विमर्श सागर जी […]

आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की पूजा Read More »

Vidhan

Vidhan 1. लेखक:- प. पूज्य श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी (संघस्थ) 2. लेखक:- प. पूज्य श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी (संघस्थ)

Vidhan Read More »

Jivani

Jivani 1. संक्षिप्त जीवन परिचय 2. भावलिंगी संत (लेखक – श्रमण श्री विचिंत्य सागर जी ‘संघस्थ ‘) 3. राष्ट्रयोगी (लेखक – सुरेश जैन ‘सरल’) 4. नगर जतारा – ध्रुव तारा (लेखक – सुभाष सिंघई , जतारा) 5. जतारा का ध्रुव तारा (लेखक – कपूर चंद जैन ‘बंसल’) 6. सर्वोदयी संत (लेखक – ज्ञानचंद जैन ‘दाऊ’)

Jivani Read More »

ज्ञान दृष्टि से सच्चा सुख

ज्ञान दृष्टि से सच्चा सुख ज्ञान दृष्टि से अज्ञान का नाश होता है अज्ञान ही दुःख का मूल कारण है। अज्ञान का समाप्त हो जाना ही सच्चा सुख है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य और पशु को समान कह दिया जाता है, और मजे की बात ये है, कि अज्ञानी मनुष्य को पशु तो कहा

ज्ञान दृष्टि से सच्चा सुख Read More »

विवेकी पुरुष

 विवेकी पुरुष मनुष्य अवगुणों का पिण्ड है। परमात्मा सद्गुणों की जीती जागती तस्वीर है। दोनों मनुष्य और परमात्मा के मध्य संतात्मा अवगुण से सद्गुण की ओर बहनेवाली नदी की तरह हैं। अवगुणों के साथ जन्म लेना दुर्भाग्य नहीं अपितु अवगुणों को छोड़े बिना ही मरण को प्राप्त हो जाना दुर्भाग्य है। मनुष्य चाहे तो अपने

विवेकी पुरुष Read More »

मोह की शराब

मोह की शराब मोह की मस्ती में जीने वालों को धर्म की बस्ती नहीं मिलती। मोह की मदिरा सबसे पुरानी है। मनुष्य मोह की शराब पीकर ही जन्म लेता है। संसारी प्राणी मोह की शराब पीकर चतुर्गति में जन्मता है। दुनियाँ में शराब पीकर मरने वाले लोग बहुत हैं। यह बात हर कोई जानता है,

मोह की शराब Read More »

ज्ञान का अहंकार

ज्ञान का अहंकार अज्ञान उतना खतरनाक नहीं होता जितना ज्ञान का अहंकार खतरनाक है। अज्ञानी इस बात को स्वीकार कर लेता है, कि हमें कुछ समझ नहीं। हमारे अंदर बुद्धि, विवेक, ज्ञान नहीं। अज्ञानी की यह समझ ही ज्ञान प्राप्ति की गहन प्यास बन जाती है। अज्ञानी ही ज्ञान की उपलब्धि करता है। ज्ञान का

ज्ञान का अहंकार Read More »

सुख तृप्ति में है

सुख तृप्ति में है आदमी का हर कृत्य, हर कर्म लाभ के लिये है। आदमी सोता है तो लाभ के लिये। जागता है तो लाभ के लिये। खाता है तो लाभ के लिये। पीता है तो लाभ के लिये। हँसता है तो लाभ के लिये। रोता है तो लाभ के लिये। पढ़ता है तो लाभ

सुख तृप्ति में है Read More »

Scroll to Top