bhavlingisant.com

What Is Jinagam Panth?

जिनागमपंथ दिवस : यह सिर्फ एक विशेष दिन या त्यौहार नहीं है, यह भारतीयता की रगों में दौड़ रहे संस्कारों और सभ्यताओं का उद्गम है। प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने सभी प्राणियों को समवशरण के माध्यम से समान शरण देते हुए उनमें श्रमण परंपरा के संस्कारों आरोपण किया।

फाल्गुन कृष्ण एकादशी के शुभ दिन प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव (भगवान आदिनाथ) को केवलज्ञान प्राप्ति के बाद, उनके मुख से प्रथम देशना खिरी तब से ही इस अवसर्पिणी काल में धर्म का प्रवर्तन हुआ। उनकी वाणी ॐकार मयी थी परंतु वास्तविक अर्थ में तो वह कल्याणमयी थी।

 तो फिर जिस दिन इस धरा-पटल पर मनुष्यों को भोगरूपी रोग से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ,

जिस दिन केवलज्ञान का सूर्य उदित हुआ और अज्ञान रूपी अंधकार का अस्त हुआ।

जिस दिन प्राणीमात्र को जीवन जीने का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त हुआ,

जिस दिन प्रथम तीर्थंकर के मुख से इस धरा को धर्म का प्रथम उपदेश प्राप्त हुआ,

वह दिन सामान्य कैसे हो सकता है ? उसे विसार देना मतलब अपनी जड़ों को ख़ुद ही काट देना।
यह तो अवसर है जिनशासन के उत्थान का,
प्रथम तीर्थंकर के उपकारों के गुणगान का।

जिस दिन “जिन” के द्वारा हमें “आगम” का पथ दिखाया गया,
जिस दिन सात तत्व और नौ पदार्थ का सत्य बताया गया।
जिस दिन हमने जाना की शरीर क्या है, आत्मा क्या है ?
अंतरात्मा, बहिरात्मा और फिर परमात्मा क्या है ?

तो फिर वह दिन “प्रथम धर्म तीर्थ प्रवर्तन : जिनागम पंथ दिवस” क्यों ना कहा जाए ?

तो आइए साथ मिलकर अपनी जड़ों को, श्रृद्धा की माटी पर, स्मृतियों के जल एवं भक्ति की खाद से पुनः पल्लवित करें। भवालिंगी संत श्रमणाचार्य श्री १०८ विमर्शसागर जी यतिराज इस भारत भूमि के वे यशस्वी पुत्र हैं जिन्होंने अपने पूर्वजों की इस विराट संस्कार संपदा को, वर्तमान जिनशासन को सौंपने का सार्थक-अथक प्रयास किया है। अतः आइए इस फाल्गुन कृष्ण एकादशी (13 फ़रवरी 2026) को तीर्थंकर श्री ऋषभदेव का ज्ञान कल्याणक महोत्सव “जिनागम पंथ यानी प्रथम धर्म तीर्थ प्रवर्तन दिवस” के रूप में उत्साह एवं हर्ष के साथ मनायें। यह हमारा अधिकार भी है और जिनशासन के प्रति कर्तव्य भी।

॥ वर्धतां जिनशासनं ॥

जिस दिन भगवान आदिनाथ केवलज्ञान प्राप्ति के बाद उनके मुख से प्रथम देशना खिरी तब से ही इस अवसर्पिणी काल में धर्म का प्रवर्तन हुआ। उनकी वाणी ॐकार मयी थी परंतु वास्तविक अर्थ में तो वह कल्याणमयी थी।

 तो फिर जिस दिन इस धरा-पटल पर मनुष्यों को भोगरूपी रोग से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ,

जिस दिन केवलज्ञान का सूर्य उदित हुआ और अज्ञान रूपी अंधकार का अस्त हुआ।

जिस दिन प्राणीमात्र को जीवन जीने का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त हुआ,

जिस दिन प्रथम तीर्थंकर के मुख से इस धरा को धर्म का प्रथम उपदेश प्राप्त हुआ,

वह दिन सामान्य कैसे हो सकता है ? उसे विसार देना मतलब अपनी जड़ों को ख़ुद ही काट देना।
यह तो अवसर है जिनशासन के उत्थान का,
प्रथम तीर्थंकर के उपकारों के गुणगान का।

जिस दिन “जिन” के द्वारा हमें “आगम” का पथ दिखाया गया,
जिस दिन सात तत्व और नौ पदार्थ का सत्य बताया गया।
जिस दिन हमने जाना की शरीर क्या है, आत्मा क्या है ?
अंतरात्मा, बहिरात्मा और फिर परमात्मा क्या है ?

तो फिर वह दिन “प्रथम धर्म तीर्थ प्रवर्तन : जिनागम पंथ दिवस” क्यों ना कहा जाए ?

तो आइए साथ मिलकर अपनी जड़ों को श्रृद्धा की माटी पर, स्मृतियों के जल एवं भक्ति की खाद से पुनः पल्लवित करें। भवालिंगी संत श्रमणाचार्य श्री १०८ विमर्शसागर जी यतिराज इस भारत भूमि के वे यशस्वी पुत्र हैं जिन्होंने अपने पूर्वजों की इस विराट संस्कार संपदा को, वर्तमान जिनशासन को सौंपने का सार्थक-अथक प्रयास किया है। अतः आइए इस “जिनागम पंथ यानी प्रथम धर्म तीर्थ प्रवर्तन दिवस” को उत्साह एवं हर्ष के साथ मनायें।

॥ वर्धतां जिनशासनं ॥

Scroll to Top