bhavlingisant.com

जैन धर्म विषयक भ्रामक तथ्य !!  Misleading facts about Jainism !!

जैन धर्म की स्थापना भगवान महावीर ने की थी?

इस प्रश्न के उत्तर जानने के पूर्व आप २ शब्दों के अर्थ को समझलें| आपने २ शब्द सुने होंगे – १. संस्थापक २. प्रवर्तक| 

संस्थापक का अर्थ होता है ” स्थापित करने वाला ” और प्रवर्तक का अर्थ होता है ” प्रवर्तन करने वाला/ पूर्व से चले आ रहे किसी कार्य या विचारधारा को आगे बढ़ाने वाला “| 

क्योंकि जैन धर्म अनादि-अनिधन धर्म है इसलिये जैन धर्म में कोई भी तीर्थंकर संस्थापक नहीं होते प्रवर्तक होते हैं|    

यदि हम किसी भी तीर्थंकर को जैन धर्म का संस्थापक मानलेंगे तो फिर हम जैन धर्म को अनादि-अनिधन कैसे कह पायेंगे? क्योंकि संस्थापक मानने का अर्थ हुआ कि जैन धर्म उन तीर्थंकर भगवंत से पूर्व इस वसुंधरा पर था ही नहीं उन्हीं तीर्थंकर भगवंत ने आकर इस जैन धर्म को चलाया है, पर ऐसा जैन सिद्धांत नहीं कहता| जैन सिद्धांत यह कहता है जैसे इस धरती का कोई आदि और अंत बिंदु नहीं हैं वैसे ही जैन धर्म का भी कोई आदि और अंत बिंदु नहीं है| 

इस पवित्र जैन धर्म को प्राप्तकर भव्य जीव सर्वप्रथम अपनी आत्मा को श्रावक धर्म के संस्कारों से संस्कारित करते हैं पीछे वही भव्य जीव श्रमण धर्म को स्वीकार करते हुए आत्मध्यान की चरम सीमा को प्राप्त करते हैं. अपने ज्ञानावरणादि कर्मों को नाशकर अरिहंत / तीर्थंकर बनते हैं और फिर वे ही अन्य भव्य जीवों के पुण्य के ज़ोर से सहज भाव से धर्म का उपदेश दिया करते हैं, तत्पश्चात वे आपने सम्पूर्ण कर्मों का क्षय कर सिद्ध गति/ आत्मा की पूर्ण शुद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं|   जिस प्रकार बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज की परंपरा अनवरत रूप से चली आ रही है उसी प्रकार जैन धर्म का प्रवर्तन अनवरत रूप से इस वसुंधरा पर होता रहता है| 

Scroll to Top