जिनागम पंथ और भावलिंगी संत
🙏 श्रमण विशुभ्रसागर
जयदु जिणागम पंथो
जयदु भावलिंगी संतो
हो जयवंत जिनागम पंथ
जिस पंथ के कंत
प्रभु परमेष्ठी अरहंत
बतलाया प्रभु ने वही पंथ
जो करता है भवसागर का अंत
वही है जिनागम पंथ!
कहा सभी अरहंतों ने
संजोया द्वादशांग रूप
गणधर भगवंतों ने,
जिसको आचरित किया
सभी संतों ने
जो अनादि से था
रहेगा अनंत काल तक
जिसका उद्घोष कर रहे हैं
वर्तमान के सच्चे भावलिंगी संत
वही है जिनागम पंथ!
तेरह, बीस आदि पंथ
होगा इन पंथों का अंत
क्योंकि,
उदय का अस्त,
जन्मे का मरण
होता है अवश्य
जिसका उदय नहीं,
न ही अस्त
अतः जो है अनादि अनिधन
वही है जिनागम पंथ!
कृतघ्नी, कृतज्ञ में अंतर सिर्फ इतना
कृतघ्नी उपकारी के उपकार नहीं मानता
कृतज्ञ मानता है सहज
कृतघ्नी वह जो
जिनागम को पड़कर उसमें भेद करे
वह है 13 और 20 पंथी
कृतज्ञ वह जो
जिनागम पढ़कर श्रद्धा करे उसकी
वही श्रद्धा है जिनागम पंथी।
जिनागम को पढ़कर डाला उसमें भेद
जिस थाली में खाया उसी में छेद
छेद-भेद करने वाला
सम्यक् कैसे हो सकता है?
जो मार्ग पर ही न हो
वह सम्यक् कैसे हो सकता है?
अतः श्रद्धा करो उस पंथ की
जो गाथा है भावलिंगी संत की
अब घर में खड़ी
दीवारों को गिरा दीजिए
गर हो, महावीर के अनुयायी
तो एक छत के नीचे आइए
और कहिए
अब विश्व में एक ही पंथ हो
“जिनागम पंथ जयवंत हो”।।
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👉 जानें क्या है जिनागम पंथ ?
जिनागम पंथ ही तीर्थंकरों द्वारा कथित अनादि-अनंत, आत्मकल्याणकारी मार्ग है, जिसमें श्रमण-श्रावक धर्म का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है।
तेरह-बीस जैसे कल्पित पंथ राग-द्वेष और विघटन का कारण हैं; वास्तविक कल्याण और एकता केवल जिनागम पंथ को स्वीकारने में ही निहित है।
👉 जैन धर्म में पंथवाद: कारण, भ्रम और जिनागम का उत्तर
जैन समाज में जन्मे 13, 20, साढ़े सोलह जैसे सभी पंथ मानव-निर्मित और समयजन्य हैं; जिनागम में केवल एक ही पंथ—सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्ग वर्णित है।
इसलिए राग-द्वेष छोड़कर सर्वज्ञों द्वारा बताए जिनागम पंथ को अपनाना ही जैन समाज की एकता, आराधना और मोक्ष का सच्चा मार्ग है।