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जानें क्या है जिनागम पंथ ?

– श्रमणाचार्य विमर्शसागर

‘जिनागम पंथ’ अनादि अनिधन, विश्व मैत्री, प्रेम, एकता का परम पावन संदेश है, जो तीर्थंकर भगवंत, केवली अरिहन्त, गणधर संत, आचार्य उपाध्याय-निग्रंथ के मुख से अतीतकाल में कहा गया, वर्तमान में कहा जा रहा है और भविष्यकाल में कहा जायेगा।
अहो ! तीर्थंकर जिन की वाणी यानि जिनवाणी, जिनश्रुत जिनागम, और इसमें वर्णित आत्महितकारी पंथ, मार्ग। यही है जिनागम पंथ।
अहो ! जिनागम में कथित पंथ अर्थात् मार्ग, यही सच्चा था सच्चा है और सच्चा रहेगा। तीर्थंकर सर्वज्ञ जिन की वाणी ही जिनागम है। और जिनागम में कथित श्रमण-श्रावकधर्म यह पंथ अर्थात् मार्ग है। जो श्रमण-श्रावकधर्म के मार्ग पर चल रहा है वह जिनागम पंथ का पथिक ‘जिनागम पंथी’ है।
सचमुच जिनागम पंथ शाश्वत था, शाश्वत है, शाश्वत रहेगा। जो जिनागम पंथ का पथिक है वह सम्यग्दृष्टि श्रावक अथवा श्रमण संज्ञा को प्राप्त जिनागम पंथी है। जो जिनागम पंथ की श्रद्धा से रहित है वह मिथ्यादृष्टि है।
अहो ! विदेह क्षेत्र में विराजित, विद्यमान बीस तीर्थंकरों के मुख से गणधरादि परमेष्ठी भगवंतों के द्वारा आज भी जिनवाणी, जिनश्रुत, जिनागम प्रगट हो रहा है।
धन्य हैं! वे भव्य जीव जो जिनागम कथित समीचीन पंथ अर्थात् जिनागम पंथ को स्वीकार कर अनादि मोह, राग-द्वेष की परम्परा का विच्छेदन कर आत्मकल्याण कर रहे हैं। अहो! जिनागम पंथ के अलावा अन्य कोई कल्याण का मार्ग नहीं है। जिनागम पंथ के अलावा अन्य पंथ उन्मार्ग हैं, अकल्याणकारी हैं।

जयदु जिणागम पंथो, रागद्दोसप्पणासगो सेयो।

पंथो तेरह – बीसो, रागादि – वडिओ असेयो ।।

जो रागद्वेष का नाश करनेवाला है, कल्याणकारी है, ऐसा ‘जिनागम पंथ जयवंत हो‘। इसके अलावा तेरह पंथ, बीसपंथ आदि पंथ, रागद्वेष को बढ़ानेवाले हैं, अकल्याणकारी हैं।
अहो ! कालदोष के कारण कतिपय विद्वानों ने तीर्थंकर जिनदेव के मुख से भाषित अर्थात् सर्वांग से खिरनेवाली दिव्यध्वनि में कथित जिनागम पंथ से बाह्य तेरहपंथ, बीसपंथ, शुद्ध तेरह पंथ आदि नाना पंथों की संज्ञाएँ रखकर परस्पर रागद्वेष को जन्म दिया है। कुछ विद्वान एवं श्रमण संज्ञा से भूषित जीवों ने भी ख्याति-पूजा-लाभ के लिए नये-नये पंथ गढ़कर भव्य जीवों का महान् अहित किया है।
अहो ! अज्ञानता, आज ये जीव इन नाना संज्ञाओं से पंथों का पोषणकर जिनागम पंथ से दूर खड़े हो गये हैं। और कल्पित पंथों का पोषणकर अपना आत्म पतन ही कर रहे हैं। तेरह-बीस आदि संज्ञाएँ जिनेन्द्र देव की वाणी से बाह्य हैं। ये जिनागम पंथ से बाह्य पंथ ही वर्तमान में राग-द्वेष का कारण बने हुये हैं। चारों तरफ समाज में विघटन, मंदिरों में खींचतान, इन कल्पित तेरह-बीस आदि पंथों की ही देन है। जिनागम पंथ सभी को एक सूत्र में बाँधकर मैत्री-प्रेम-वात्सल्य का संदेश देता है।
अहो ! आज भी यदि स्वकल्पित पंथों का दुराग्रह छोड़कर सब जीव जिनेन्द्र देव की वाणी यानि जिनवाणी जिनागम में श्रद्धा रखें, और जिनागम वर्णित पंथ यानि ‘जिनागम पंथ’ को सच्ची श्रद्धा से स्वीकारें, तो सर्व समाज में आज भी एकता का सूत्रपात हो सकता है। आपस के रागद्वेष मिट सकते हैं और जिनशासन गौरवान्वित हो सकता है।

‘जयदु जिणागम पंथो।’

‘जिनागम पंथ जयवंत हो।’

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जिनागम में वर्णित पंथ ही जिनागम पंथ है-

“जिनागम पंथ जैन धर्म का शाश्वत, जिनवाणी आधारित मूल मार्ग है, जो राग-द्वेष से मुक्ति और आत्मकल्याण का सच्चा पथ दिखाता है।“जिनागम पंथ जैन धर्म का मूल मार्ग है, जो तीर्थंकरों की वाणी—जिनवाणी/जिनश्रुत—पर आधारित है और अहिंसा, बिना राग-द्वेष, आत्मकल्याण का संदेश देता है। यह पंथ शाश्वत है और अन्य कल्पित पंथों से अलग, सच्चा, एकता एवं प्रेम की ओर प्रेरित मार्ग प्रदान करता है।”

 

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