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जैन धर्म में पंथवाद: कारण, भ्रम और जिनागम का उत्तर

 

जैन समाज और पंथवाद की वर्तमान स्थिति

 

सदाचार, आत्मीयता, समन्वय और बंधुत्व जैसे उदात्त गुणों से सुशोभित जैन समाज, पंथ की चर्चा आते ही अपने गुणों को विस्मृत कर द्वेष, घृणा, वैमनस्य और कषाय से भर जाता है।
किसी जैनी से पूछ लीजिए— “आप किस पंथ के हैं?”
बस इतना कहते ही उसकी मधुर वाणी में तीखापन और असूया का भाव उतर आता है।

पंचरंगी ध्वज और कई पंथों का विरोधाभास

 

पाँच रंगों का ध्वज धारण करने वाली जैन समाज जब “पंथ” का नाम सुनती है, तो अपने-अपने रंगों (पंथों) का अलग झण्डा उठा लेती है— कोई 13 पंथ का, कोई 20 पंथ का, कोई साढ़े सोलह पंथ का, कोई शुद्ध तेरह पंथ का और कोई तारण पंथ का।

हमारे जैनी भाईयों के पास अपने प्राचीन सिद्धक्षेत्रों और अतिशय क्षेत्रों के पोषण के लिए समय न सही, पर अपने-अपने पंथों के पोषण और प्रचार के लिए सभी कटिबद्ध हैं।

अहिंसा का उद्घोष करने वाला वही जैन समाज जिसने गिरनार, बद्रीनाथ, बालाजी जैसे तीर्थों को अपनी आँखों के सामने खो दिया, वह “पंथ” के नाम पर इतना हिंसक रूप धारण कैसे कर लेता है?

जैन एकता की विडंबना

 

आज जनसंख्या में मुट्ठीभर कही जाने वाली जैन समाज “पंथ” सुनते ही अपनी मुट्ठी खोलकर अन्य समाजों को बताने लगती है कि हम एक नहीं, अनेक हैं — अखण्ड नहीं, खण्ड-खण्ड हैं।

वह समाज, जो राग-द्वेष से रहित वीतराग देव, वीतराग गुरु और वीतरागता का उपदेश देने वाली जिनवाणी की पूजा-आराधना करती है, उसी समाज के आराधक आराधना-विधि को लेकर एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष से कब और कैसे भर गए?

शिक्षित समाज में अज्ञान का प्रश्न

 

भगवान महावीर स्वामी के पंचशील सिद्धांतों की अनुयायी जैन समाज, पंचशील की बजाय पंच “अशील” पंथों की अनुयायी होकर स्वयं को गौरवान्वित क्यों मानने लगी?


एक शिक्षित और विवेकी समाज कहलाने के बावजूद धर्म क्षेत्र में इतना अज्ञान और अविवेक क्यों?

पंथ शब्द का सही अर्थ

आज जो “पंथ” शब्द विवाद का केंद्र बना हुआ है, पहले यह समझें कि “पंथ” है क्या।
‘पंथ’ शब्द का अर्थ है – मार्ग, रास्ता।
और उस मार्ग पर चलने वाला पंथी कहलाता है।

क्या 13–20 पंथ जिनागम में वर्णित हैं?

अब मूल प्रश्न पर आते हैं —

जब हम अपने को 13 पंथी, 20 पंथी, या साढ़े सोलह पंथी कहते हैं,
तो प्रश्न उठता है—इन नामों का उल्लेख किस सर्वज्ञ देव की वाणी में है?

वर्तमान में सर्वज्ञ का अभाव है; अतः आचार्य कुन्दकुन्द कहते हैं—

“आगम चक्खू साहू”

अर्थात साधु का प्रमाण आगम है। तो अब एक ही प्रमाण बचता है — जिनागम।
क्या इन पंथों का नाम जिनागम में है?

हम स्वयं को भगवान महावीर स्वामी का अनुयायी कहते हैं —
तो क्या कम से कम इन पंथों का इतिहास ज्ञात है?
कौन से आगम, कौन से सूत्र, कौन से काल में इनका नाम आया?
क्यों न इसकी जानकारी की जाए?

आगम में एकमात्र मार्ग

चार अनुयोग रूप जिनागम में किसी एक भी पंथ का नाम नहीं मिलता।
वहाँ तो केवल एक पंथ है —

“सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः।”

इसी पंथ की व्याख्या आदिनाथ से महावीर तक सभी तीर्थंकरों ने की है, और भविष्य में भी करेंगे।
वे न 13 पंथ बताएंगे, न 20 पंथ। जब जिनागम में हितकारी पंथ पहले से वर्णित है, तो नए पंथों की आवश्यकता कहाँ रह जाती है?

नए पंथ कैसे बने?

जिनागम के अतिरिक्त समय-समय पर छद्मस्थों ने अपनी सुविधा, न समझ या कषाय पूर्ति के कारण नए पंथ बनाए।
किसी बात पर मतभेद हुआ, कोई विधि समझ नहीं आई—
वक्त का पुण्य साथ हुआ तो अनुयायी भी मिल गए — बस नया पंथ स्थापित हो गया।
जैसे एक गाँव में मंदिर विवाद से दूसरा मंदिर बन जाता है, मंदिर बनाने वाले तो चले गए, पर उनके वारिस आज तक लड़ रहे हैं।
ठीक यही इतिहास पंथों का है। पंथ बने, चल पड़े और फिर झगड़ों का कारण बने। 
इन पंथों का ठोस इतिहास नहीं, और जो मिलता है वह हास्यास्पद।

13, 20 और अन्य पंथों का इतिहास (संक्षिप्त)

१. जयपुर के 33 लोगों के संगठन में पूजा-विवाद —
13 ने अचित्त पूजा अपनाई, 20 ने सचित्त।
बस, 13 पंथ और 20 पंथ तैयार।
उनकी लड़ाई हम आज तक लड़ रहे हैं।

२. कहीं लिखा मिलता है —
13 पंथ की स्थापना पं. दौलतराम के पुत्र गुमानीराम ने की।
कहीं मिलता है —
पं. बनारसीदास (आगरा) ने 450–500 वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत की।

३. नागौर में कुछ विद्वानों ने 13 और 20 की कुछ-कुछ बातें न मानीं।
अपने हिसाब से विधि बनाई —
कहा — “न 13, न 20 — हम साढ़े सोलह।”
और नया पंथ तैयार।

४. शुद्ध तेरह पंथ —
अभी-अभी जन्मा नवपंथ।
इसके आते ही पुराने 13 पंथ अशुद्ध घोषित।

५. तारण पंथ —
500 वर्षों पूर्व शुरू।
एक संत की उपाधि “तारण तरण।’
नाम का ज्ञान अज्ञात —
पर पंथ तैयार।

६. श्वेताम्बर पंथ —
भद्रबाहु काल के 12 वर्षीय अकाल से परिचित ही हैं।

अब विचार यह है —
इन सबके पहले भी जैन समाज तो किसी मार्ग पर चलता था—वो था जिनागम पंथ

आचार्यों और साधुओं का भ्रम

पर पंचम काल के प्रभाव से आज साधु-संत भी जिनागम में बताए मार्ग को छोड़ विद्वानों द्वारा बनाए पंथों के अनुयायी हो गए।
वीतराग कहलाने वाले साधु स्वयं को 13–20 पंथी बताने में सम्मान समझते हैं।
अब जब ये साधु-श्रावक एक-दूसरे से मिलते हैं —
बताओ, वीतराग धर्म जयवंत होता है या राग-द्वेष?

जिनागम पंथ जयवंत हो — एकता का स्वर्ण नारा

नाना पंथों में उलझे श्रावकों और संतों से जैन समाज की एकता डगमगा रही है।
इसीलिए नारा दिया गया—
“जिनागम पंथ जयवंत हो।”

जिनागम पंथ क्या है?

समवसरण में जिनेन्द्र की दिव्यध्वनि,
गणधर द्वारा चार अनुयोगों में गूंथी गयी,
आचार्यों द्वारा लिपिबद्ध—
यह जिनागम है।
और जिनागम में बताया गया मार्ग—जिनागम पंथ

क्या एक नया पंथ बनाया जा रहा है?

संभव है कोई कह दे —
“लो, आचार्यश्री ने नया पंथ चला दिया।”
नहीं।
न कोई नया नियम, न कोई अलग मार्ग।
सवाल यही—
जब सर्वज्ञों ने केवल एक मार्ग बताया,
तो मनुष्यों द्वारा बनाए पंथों को क्यों ओढ़ें?

आचार्य श्री का स्पष्ट संदेश —

जिन पंथों का नाम तक जिनागम में नहीं —
उनका वस्त्र उतार फेंको,
और सर्वज्ञ देव द्वारा चार अनुयोग रूप जिनागम में बताए पंथ को अपनाओ।

जिनागम आधारित आराधना ही समाधान

आराधना-विधि की बात करें — 24 तीर्थंकर हमारे आराध्य हैं।
अब प्रश्न यह नहीं कि कितने पंथ हैं,
बल्कि यह है—
पूजन छद्मस्थों की बनाई विधि से होगी या जिनागम में बताए मार्ग से?

निष्कर्ष

जिनागम में वर्णित मार्ग अनादि-अनंत है।
बाकी पंथ समयजन्य, मानव निर्मित और कषाय आधारित हैं।
अतः इन पंथों के वसन उतार कर
जिनवाणी में बताए मार्ग को स्वीकार करें—
यही जिनागम पंथ है, यही मोक्षमार्ग है।

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👉 जानें क्या है जिनागम पंथ ?

“जिनागम पंथ जैन धर्म का शाश्वत, जिनवाणी आधारित मूल मार्ग है, जो राग-द्वेष से मुक्ति और आत्मकल्याण का सच्चा पथ दिखाता है। जिनागम पंथ जैन धर्म का मूल मार्ग है, जो तीर्थंकरों की वाणी—जिनवाणी/जिनश्रुत—पर आधारित है और अहिंसा, बिना राग-द्वेष, आत्मकल्याण का संदेश देता है। यह पंथ शाश्वत है और अन्य कल्पित पंथों से अलग, सच्चा, एकता एवं प्रेम की ओर प्रेरित मार्ग प्रदान करता है।”

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