Form of God in Jainism – Jain Perspective (जैन धर्म में ईश्वर का स्वरुप)
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Introduction | क्या जैन धर्म ईश्वर को मानता है?
अक्सर यह कहा जाता है कि जैन धर्म (Jainism) एक नास्तिक दर्शन है, क्योंकि यह किसी ऐसे ईश्वर को नहीं मानता जो संसार का निर्माता, नियंत्रक और संहारक हो। लेकिन यह धारणा अधूरी और भ्रामक है कि “जैन धर्म ईश्वर को नहीं मानता”। वास्तव में जैन दर्शन न केवल ईश्वर को मानता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि ईश्वर बनते कैसे हैं?
जहाँ अधिकांश धर्मों में ईश्वर की उपासना का वर्णन मिलता है, वहीं जैन धर्म एक कदम आगे जाकर बताता है कि प्रत्येक आत्मा में Godhood की potential मौजूद है। जैन दर्शन में ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि आत्मा की परम शुद्ध अवस्था है।
जैन दर्शन में ईश्वर की परिभाषा (Definition of God in Jainism)
जैन दर्शन के अनुसार आत्मा के पर्यायगत विकास की पूर्णता को ही परमात्मा (God) कहा जाता है। आत्मा जब अपने सभी कर्मों का क्षय कर लेती है, तब वह अपने शुद्ध, अनंत और स्वतंत्र स्वरूप में स्थित हो जाती है — यही अवस्था ईश्वर की अवस्था है।
इसी भाव को जैन आगमों में कहा गया है:
“अप्पा सो परम अप्पा”
अर्थात आत्मा ही परमात्मा है।
जैन धर्म ईश्वर को कर्ता क्यों नहीं मानता?
जैन दर्शन ईश्वर को संसार का निर्माता (Creator), पालनकर्ता (Controller) या संहारक (Destroyer) नहीं मानता। ईश्वर को निष्क्रिय नहीं, बल्कि निर्लिप्त और तटस्थ ज्ञाता-दृष्टा माना गया है।
इस दृष्टिकोण के पीछे गहरी तार्किकता है। यदि ईश्वर संसार का कर्ता माना जाए, तो अनेक प्रश्न स्वतः खड़े हो जाते हैं:
- संसार की असमानता का उत्तरदायित्व किसका होगा?
- किसी को सुख और किसी को दुःख क्यों मिला?
- अपराध, हिंसा और अन्याय के लिए दोषी कौन होगा?
जैन दर्शन मानता है कि इन सभी प्रश्नों का उत्तर कर्म सिद्धांत (Law of Karma) में निहित है, न कि किसी ईश्वर की इच्छा में।
कर्म सिद्धांत: न्यायपूर्ण व्यवस्था
जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है। मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके पूर्व कर्मों का परिणाम है और भविष्य उसके वर्तमान पुरुषार्थ से निर्मित होता है।
यह सिद्धांत ईश्वर को दोषमुक्त करता है और जीव को self-responsibility की शिक्षा देता है। यही कारण है कि जैन दर्शन को एक scientific और ethical philosophy कहा जाता है।
शक्ति रूप और अभिव्यक्ति रूप परमात्मा
जैन दर्शन में परमात्मा को दो दृष्टियों से समझा जाता है:
1. शक्ति रूप परमात्मा (Potential God)
प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता मौजूद है। यह क्षमता शक्ति रूप परमात्मा कहलाती है। जैसे एक नवजात शिशु में डॉक्टर बनने की क्षमता होती है, वैसे ही प्रत्येक आत्मा में ईश्वर बनने की क्षमता होती है।
2. अभिव्यक्ति रूप परमात्मा (Manifest God)
जिस आत्मा ने अपने सभी कर्मों का क्षय कर लिया है और जिसने परम शुद्ध अवस्था को प्राप्त कर लिया है, वह अभिव्यक्ति रूप परमात्मा कहलाती है।
जैन धर्म में ईश्वर की प्रमुख विशेषताएँ
जैन दर्शन में ईश्वर की अनेक विशेषताएँ बताई गई हैं, लेकिन तीन विशेषताएँ अद्वितीय मानी जाती हैं:
1. वीतरागी (Vitaragi)
ईश्वर पूर्ण रूप से राग-द्वेष से मुक्त होता है। इसलिए वह न किसी को वरदान देता है, न शाप।
2. सर्वज्ञ (Omniscient)
ईश्वर भूत, वर्तमान और भविष्य — तीनों कालों के सभी पदार्थों को जानता है।
3. हितोपदेशी (Benefactor)
ईश्वर का उपदेश पूर्णत: निष्पक्ष और सभी के कल्याण के लिए होता है।
ईश्वर बनने की प्रक्रिया (How One Becomes God in Jainism)
जैन दर्शन में ईश्वर बनने की प्रक्रिया चरणबद्ध है:
- मनुष्य पर्याय की प्राप्ति।
- सच्चे देव-शास्त्र-गुरु पर श्रद्धा।
- अणुव्रतों से महाव्रतों की ओर अग्रसर होना।
- आत्मध्यान द्वारा चार घातिया कर्मों का क्षय।
- अरिहंत अवस्था और केवलज्ञान की प्राप्ति।
- शेष अघातिया कर्मों का क्षय।
- सिद्ध अवस्था की प्राप्ति।
सिद्ध अवस्था में आत्मा पूर्णत: स्वतंत्र, शुद्ध और आनंदमय होती है।
कर्मों का क्षय और आत्मा की मुक्ति
जैन दर्शन में कुल आठ कर्म माने गए हैं:
घातिया कर्म (Destructive Karmas)
- ज्ञानावरणीय
- दर्शनावरणीय
- मोहनीय
- अंतराय
अघातिया कर्म (Non-destructive Karmas)
- वेदनीय
- आयु
- नाम
- गोत्र
इन कर्मों के पूर्ण क्षय के बाद आत्मा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करती है।
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निष्कर्ष | Conclusion
जैन धर्म में ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि आत्मा की सर्वोच्च अवस्था है। यह दर्शन मनुष्य को भक्त से भगवान बनने की प्रेरणा देता है। जैन दर्शन का ईश्वर न्यायपूर्ण, तार्किक और कर्म-आधारित व्यवस्था का प्रतीक है।
यही कारण है कि जैन धर्म का ईश्वर-सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि आधुनिक युग में भी relevant और rational है।