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बौद्ध साहित्य में दिगम्बर मुनियों का वर्णन अनेकों स्थानों में मिलता है यथा

“पाटिक पुत्र अचेलो” अर्थात् पाटिक पुत्र नामक साधु वत्र रहित अचेलक अर्थात् दिगम्बर जैन मुनि थे।

चीनी त्रिपिटक नामक ग्रंथ में भी ‘अचेलक’ शब्द से दिगम्बर जैन मुनि/साधु ही उद्घोषित किया है।

बौद्ध टीकाकार बुद्ध घोष भी- अचेलक शब्द का अर्थ भाव नग्न ही करते है।

जैसा कि दिगम्बर जैन शास्त्रों में अचेलक्य की परिभाषा दो प्रकार से दी है-

1) द्रव्य (बाहर) से अचेलक्य

2) भाव (अंतर) से अचेलक्य ।

यथा- द्रव्य अचेलक्य की परिभाषा “मूलाचार ग्रंथ” में इस प्रकार से ही है-

“वत्थाजिण वक्केण य अहवा पत्ताइणा असंवरणं।
णिब्भूसण णिग्गंथं अच्चेलक्कं जगदि पूज्जं ।।”

अर्थात् वस्त्र, वक्कल अथवा पत्र आदि के आवरण से रहित तथा सभी प्रकार के आभूषणों से रहित निर्ग्रंथ ही जगत पूज्य अचेलक कहे जाते हैं।

बौद्ध साहित्य में दिगम्बर जैन मुनियों को निर्ग्रंथ और अचेलक ही कहा है और निर्ग्रंथ तथा ‘अचेलक’ शब्द को एक ही भाव (Sense) में प्रयुक्त किया है यथा दीर्घ निकाय में लिखा है कि-

PASENDI, KING OF KOSAL SALUTED NIGANTNAS.”

अर्थात- कौशल देश का राजा पसनदी (प्रसेन जित) निर्ग्रंथों (दिगम्बर जैन मुनियों) को नमस्कार करता था।

महावग्ग में भी कहा है कि – “एक बड़ी संख्या में निग्रंथ गण (दिगम्बर जैन मुनि) वैशाली में सड़क-सड़क और चौराहे-चौराहे पर शोर मचाते दौड़ रहे थे अर्थात् स्तोत्र पाठादि करते हुए तेजी से जा रहे थे।”

इस उल्लेख से दिगम्बर मुनियों का उस समय निर्बाध रूप से राजमार्गों से विचरण करने का समर्थन होता है। वे अष्टमी और चतुर्दशी को इकट्ठे होकर उपदेश दिया करते थे।

‘दाठावंसो’ में ‘अहिरिका’ शब्द के साथ-साथ निगण्ठ शब्द का प्रयोग जैन साधु के लिए हुआ मिलता है।

‘इसमें अहिरिका सव्वे सद्धादिगुण वज्जिता । यद्धा सठाच दुप्पज्जा सग्गमोक्ख वि बन्धका ।। 88 ।। इति सो चिन्तयित्वान गृहसीवो नराधियो। पव्वाजेसि सकारट्ठा निगण्ठे ते अपेसके ।।”

बौद्ध शास्त्रों में ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जो भगवान महावीर के पहले दिगम्बर मुनियों का होना सिद्ध करते हैं। बौद्ध साहित्य में अंतिम तीर्थकर विश्च महावीर के अतिरिक्त श्री सुपार्श्व, अनन्तजिन और पुष्पदंत के भी नामोल्लेख मिलते हैं।

“महावग्ग” (1/22-23 SEB. P. 144) में लिखा है कि

बुद्ध राजगृह में जब पहले-पहले धर्म प्रचार को आए तो लाठी वन में “सुप्पतिप्श्य” सुपार्श्वनाथ (तीर्थंकर) के मंदिर में ठहरे। इसके बाद इस मंदिर में ठहरने का उल्लेख नहीं मिलता है। इसका कारण यही है कि इस जैन मंदिर के प्रबन्धकों ने जब यह जान लिया कि महात्मा बुद्ध अब जैन मुनि नहीं रहे तो उन्होंने उनका आदर करना रोक दिया। (विशेष के लिए देखो भमबु)”

उपक आजीवक अनंतार्जन (अनंतनाथ तीर्थंकर) को अपना गुरु बताता है आजीविकों ने जैन धर्म से बहुत कुछ लिया था। अतः यह अनंतजिन तीर्थंकर ही होना चाहिए।”

आरिय-परियेषण-सुत

‘महावस्तु’ में पुष्पदंत (पुष्पदंत तीर्थंकर) को एक बुद्ध और 32 लक्षणयुक्त महापुरुष बताया गया है।”

यद्यपि उनके सम्बन्ध में यह स्पष्ट उल्लेख नहीं है, कि वे जैन तीर्थंकर और नग्न थे, किन्तु जब जैन साहित्य में उस नाम के दिगम्बर भेषधारी तीर्थंकर महामुनीश मिलते है, तब उन्हें जैन और नग्न मानना अनुचित नहीं है। वैसे बौद्ध साहित्य भगवान पार्श्वनाथ के तीर्थवर्ती मुनियों को नग्न प्रगट करता है।

भरी जवानी में ही महावीर स्वामी ने राजपाट का मोह त्याग कर दिगम्बर मुनि का भेष धारण किया था। और तीस वर्ष तक कठिन साधना करके वह सर्वज्ञ और सर्वदर्शी तीर्थंकर हो गये थे। ‘मञ्झिमनिकाय’ नामक बौद्ध ग्रंथ में उन्हें सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और अशेष ज्ञान तथा दर्शन का ज्ञाता लिखा है।

एक समय नेपाल के तांत्रिक बौद्धों में नग्न साधुओं का अस्तित्व हो गया था। नेपाल में गूढ़ और तांत्रिक नाम की एक बौद्ध धर्म की शाखा है। मि. हासन ने लिखा है कि इस शाखा में नग्न यति रहा करते हैं।

जेम्स एल्वी. प्रो. जैकोबी तथा डॉ. बुल्हर इस ही बात का समर्थन करते हैं कि दिगम्बरत्व महात्मा बुद्ध से पहले से ही प्रचलित था और आजीविक आदि तीर्थकों पर जैन धर्म का प्रभाव पड़ा यथा –

IN JAMES D’ALWIS’ PAPER (IND. ANTI. VIII) ON THE SIX TIRTHANKAR THE “DIGAMBARAS” APPEAR TO HAVE BEEN REGARDED AS AN OLD ORDER OF ASEETIES & ALL OF THESE HERETICAL TEACHERS BETRAY THE INFLUENCE OF JAINISM IN THEIR DOCTRINES”.

PROF. JACOBI REMARKS: “THE PRECEDING FOUR TIRTHANKAS (MAKKHALLI COASTAL ETC.) APPEAR ALL TO HAVE ADOPTED SOME OR OTHER DOCTRINES OR PRACTICES, WHICH MAKES PART OF THE JAINA SYSTEM, PROBABLY FROM THE JAINS THEMSELVES. IT APPEARS FROM THE PROBABING REMARKS THAT JAINA IDEAS & PRACHINDE MUST HAVE BEEN PRECEDING THE TIME OF MAHAVIRA & INDEPENDENTLY OF HIM. THIS CUMBINED WITH OTHER ARGUEMENTS, LEADS US TO THE EXISTENCE LONG BEFORE MAHAVIRA.

PROF. T. W. RHYS DAVIDS NOTES IN THE “VINAYA TEXTS THAT “THE SECT NOW CALLED JAINS ARE DIVIDED INTO THE CLASSES. DIGAMBARAS & NOVETAMBARAS THE LATER OF WHICH IN NAKED. THEY ARE KNOWN TO BE THE SUCCESSORS OF THE SCHOOL CALLED NIGANTHAS IN THE PALL PITAKAS”.

DR. BUHLER WRITES, “FROM BUDDHIST ACCOUNTS IN THEIR COLONICAL WORKS AS WELL AS IN OTHER BOOKS, IT MAY BE SEEN THAT THIS RIVAL (MAHAVIRA) WAS A DANGEROUS & INFLUENTIAL ONE & THAT EVEN IN BUDDHA’S TIME HIS TEACHING HAD SPREAD, CONSIDERABLY……ALSO THEY SAY IN THEIR DESCRIPTION OF OTHER RIVALS OF BUDDHA THAT THERE IN ORDER TO GAIN ESTEEM COPIED THE NIRHANTHAS & WENT UNCLOTHED OR THAT THEY WERE LOOKED UPON BY THE PEOPLE AS NIRGRANTHA HOLY ONES, BECAUSE THEY HAPPENED TO LOST THEIR CLOTHES”.

सम्बन्ध बौद्ध ग्रंथों के आधार से इस विषय में डॉ. स्टीवेन्सन लिखते हैं-

जैसिभा, I A2 & 3A 24 THE PEOPLE BOUGHT CLOTHES IN AN ABUNDANCE FOR HIM, BUT HE (KASSAPA) REFUSED THEM AS HE THOUGHT THAT IF HE PUT THEM ON, HE WOULD NOT BE TREATED WITH THE SOME RESPECT KASSAPA SAID, “CLOTHES ARE FOR THE COVERING OF SHAME & SHAME IS THE EFFECT OF SIN. I AM AN ARAHAT AS I AM FREE EVIL DESIRES, I KNOW NO SHAME” ETC.

“(एक तीर्थक नग्र हो गया) लोग उसके लिए बहुत से वस्त्र लाये, किन्तु उनको उसने स्वीकार नहीं किया। उसने यही सोचा कि ‘यदि मैं वस्त्र स्वीकार करता हूँ, तो संसार में मेरी अधिक प्रतिष्ठा नहीं होती। वह कहने लगा कि लज्जा रक्षक के लिए ही वस्त्र धारण किया जाता है और लज्जा ही पाप का कारण है, हम अर्हत् है, इसलिए विषय-वासना से अलिप्त होने के कारण हमें लज्जा की कुछ भी परवाह नहीं।’ इसका यह कथन सुनकर बड़ी प्रसन्नता से वहाँ इसके पाँच सौ शिष्य बन गये, बल्कि जम्बूद्वीप में इसी को लोग सच्चा बुद्ध कहने लगे।”

यह उल्लेख संभवतः मक्खलि गोशाल अथवा पूर्ण काश्यप के सम्बन्ध में है। ये दोनों साधु भगवान पार्श्वनाथ की शिष्य परम्परा के मुनि थे।”

मक्खलि गोशाल भगवान महावीर से रुष्ट होकर अलग धर्म प्रचार करने लगा था, और वह “आजीविक” सम्प्रदाय का नेता बन गया था। इस सम्प्रदाय का विकास प्राचीन जैन धर्म से हुआ था।” और इसके साधु भी नग्न रहते थे।”

पूरण- कश्यप गोशाल का साथी था, और वह भी दिगम्बर रहा था, जिसका प्रभाव इन लोगों पर पड़ा था। उस पर भगवान महावीर के अवतीर्ण होते ही दिगम्बरत्व का महत्व और भी बढ़ गया। यहाँ तक कि दूसरे सम्प्रदायों के लोग भी नग्न वेष धारण करने को लालायित हो गये जैसा कि ऊपर प्रकट किया गया है।

बौद्ध शास्त्रों में निर्ग्रंथ (दिगम्बर) महामुनि महावीर के विहार का उल्लेख भी मिलता है। ‘मञ्झिम निकाय’ के ‘अभय राजकुमार सुंत’ से प्रगट है कि वे राजगृह में एक समय रहे थे।”

‘उपालीसुत’ से भगवान महावीर का नालन्दा में विहार करना स्पष्ट है। उस समय उनके साथ बड़ी संख्या में निर्ग्रथ साधु थे।”

“THE M. N. TELLS US THAT ONCE NIGANTHA NATHAPUTTA WAS AT NALANDA WITH A BIG RETINUE OF THE NIGANTHAS”

दीर्घनिकाय का “पासादिक सूत्र” भी इस बात का समर्थन करता है।

“संयुक्त निकाय” से भगवान महावीर का संघ रहित ‘मच्छिका खण्ड’ में विहार करना स्पष्ट है।”

ब्रह्मजाल सूत्र में राजगृह के राजा अजात शत्रु को भगवान महावीर स्वामी के दर्शन के लिए ऐसा लिखा गया है।

“विनय पिटक” के महावग्ण ग्रंथ से भगवान महावीर का वैशाली में धर्म प्रचार प्रमाणित है।”

एक “जातक” में भगवान महावीर को “अचेलक नातपुत्र” कहा गया है।

“महावस्तु” से प्रकट है कि अवंति के राज पुरोहित का पुत्र नालक बनारस आया था। वहाँ उसने नातपुत्र (महावीर को) धर्म प्रचार करते पाया।”

दीर्घनिकाय से स्पष्ट है कि कौशल के राजा पसेनदी ने निग्रंथ नातपुत्र (महावीर) को नमस्कार किया था।”

उसकी रानी मल्लिका ने निर्ग्रन्थों के उपयोग के लिए एक भवन बनवाया था।”

सारांशतः 

बौद्धशास्त्र श्री भगवान महावीर के दिगन्त व्यापी और सफल विहार की साक्षी देते है।

सम्राट हर्ष के समय में (7वीं श.) चीन देश से ह्यूनसांग नामक यात्री भारत आया था। उसने भारत और भारत के बाहर दिगम्बर जैन मुनियों का अस्तित्व बतलाया है।

“HIEUN TSANG FOUND THEM (JAINS) SPREAD THROUGH THE WHOLE OF INDIA AND EVEN BEYOND ITS BOUNDARIES.

वह उन्हें निर्ग्रन्थ और नंगे साधु लिखता है, तथा उनकी केशलुञ्चन क्रिया का भी उल्लेख करता है।

“THE LI-HI (NIRGRANTHAS) THEMSELVES BY LEAVING THE ADIES NALED AND PULLING OUT THEIR HAIR. THEIR SKIN IS ALL CRACKED THEIR BODIES NALED AND PULLING OUT THEIR HAIR. THEIR SKIN IS ALL CRACKED THEIR FEET ARE HARD AND CHAPPED LIKE COTTING TREES.”

  • वह पेशावर की ओर से भारत में घुसा था, और वहीं सिंहपुर में उसने नंगे जैन मुनियों को पाया था।
  • “बौद्धों और जैनियों की भी संख्या बहुत अधिक थी।. … बहुत से प्रांतीय राजा भी इनके अनुयायी थे। इनके धार्मिक सिद्धांत और रीति-रिवाज भी तत्कालीन समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे साधुओं, तपस्वियों, भिक्षुओं और यतियों का एक बड़ा भारी समुदाय था, जो उस समय के समाज में विशेष महत्व रखता था।…..(हिन्दुओं में) बहुत से साधु अपने निश्चित स्थानों पर बैठे हुये ध्यान-समाधि करते थे, जिनके पास भक्त लोग उपदेश सुनने आया करते थे। बहुत से साधु शहरों व गाँवों में घूम-घूमकर लोगों को उपदेश व शिक्षा दिया करते थे। यही हाल बौद्ध भिक्षुओं और जैन साधुओं का भी था। .. साधारणतः लोगों के जीवन को नैतिक एवं धार्मिक बनाने में इन साधुओं, यतियों और भिक्षुओं का बड़ा भारी भाग था।”
  • फलतः उस देश का राजकुमार आर्द्रक निर्ग्रन्थ साधु हो गया था।”
  • बौद्ध शास्त्र वैशाली के दिगम्बर मुनियों के सुणक्खत्त एक ‘लिच्छवि’ राजपुत्र था और वह बौद्ध धर्म को छोड़ कर निर्ग्रन्थ मत का अनुयायी हुआ था।”

वैशाली के सन्निकट एक कण्डरमसुक नामक दिगम्बर मुनि के आवास का भी उल्लेख बौद्ध शास्त्रों में मिलता है। उन्होंने यावत् जीवन नग्न रहने और नियमित परिधि में विहार करने की प्रतिज्ञा कर ली थी।

“अचेलो कन्उरमसुको वसोलियम् पटिवसति लाभग्ग-प्पतोच एव पसंग्ण, प्पत्तोच वज्जिगा में। तस्स सत्तवत्त पदानि समत्तानि समादिन्नानि होन्ति- ‘यावजीवम् अचेलको अस्स्म, नटत्त्थम् परिहेय्यम् यावजीवम् ब्रह्मचारी अस्स्म्न मेथनुम पटिसेवेय्यम्…… इत्यादि ।”

  • श्रावस्ती के कुलपुत्र (Councillor’s son) अर्जुन भी दिगम्बर मुनि होकर सर्वत्र विवो थे।”
  • यह दिगम्बर मुनि और उसके साथ जैन साध्वियाँ भी सर्वत्र धर्मोपदेश देकर मुमुक्षुओं को जैन धर्म में दीक्षित करते थे।”

इस उद्देश्य को लेकर वे नगरों के चौराहों पर जाकर धर्मोपदेश देते और वादभेरी बजाते थे। बौद्ध शास्त्र कहते हैं कि, “उस समय तीर्थंकर साधु प्रत्येक पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और पूर्ण मासी को एकत्र होते थे और धर्मोपदेश करते थे। लोग उसे सुनकर प्रसन्न होते और उसके अनुयायी बन जाते थे।”

भगवान महावीर और महात्मा गौतम बुद्ध दोनों ने ही अहिंसा धर्म का उपदेश दिया था। किन्तु भगवान महावीर की अहिंसा में मन, वचन, काय पूर्वक जीव हत्या से विलग रहने का विधान था-भोजन या मौज, शौक के लिए भी उसमें जीवों का प्राण व्यपरोपण नहीं किया जा सकता था। इसके विपरीत महात्मा बुद्ध की अहिंसा में बौद्ध भिक्षुओं को मांस और मत्स्य भोजन ग्रहण करने की खुली आज्ञा थी। एक बार नहीं, अनेक बार स्वयं महात्मा बुद्ध ने मांस भक्षण किया था। {भमबु. पृ. 170 }

ऐसे ही अवसरों पर दिगम्बर मुनि, बौद्ध भिक्षुओं को आड़े हाथों लेते थे। एक मरतबा जब भगवान महावीर ने बुद्ध के इस हिंसक कर्म का निषेध किया। तो बुद्ध ने कहा, ‘भिक्षुओं, यह पहला मौका नहीं है, बल्कि नातपुत्र (महावीर) इससे पहले भी कई मरतबा खास मेरे लिये पके हुये मांस को मेरे भक्षण करने पर आक्षेप कर चुके हैं। {cowell jatakas ||, 182 , भमबु. पृ. 246 }

एक दूसरी बार जब वैशाली में महात्मा बुद्ध ने सेनापति सिंह के घर पर मांसाहार किया तो बौद्ध शास्त्र कहता है, कि “निर्ग्रन्ध एक बड़ी संख्या में वैशाली में सड़क-सड़क, चौराहे-चौराहे पर यह शोर मचाते कहते फिरे, कि आज सेनापति सिंह ने एक बैल का वध किया है और उसका आहार श्रमण गौतम बुद्ध के लिए बनाया है। श्रमण गौतम बुद्ध जानबूझकर कि यह बैल मेरे आहार के निमित्त मारा गया है, यह जान कर भी वह पशु का मांस खाता है, इसलिए वही उस पशु को मारने के लिए वधक है।”

AT THE TIME A GREAT NUMBER OF THE NIGATHAS (RUNNING) THROUGH VAISALI, FROM ROAD TO ROAD, CROSS-WAY TO CROSS-WAY, WITH OUTSTRETCHED ARMS CRIED. “TODAY SIMHA, THE GENERAL HAS KILLED A GREAT OX AND HAS MADE A MEAL FOR THE SARMANA GOTAMA. THE SARMANA GOTAMA KNOWINGLY EATS THIS MEAT OF AN ANIMAL KILLED FOR THIS VERY PURPOSE AND HAS THAT BECOME VIRTUALLY THE AUTHOR OF THAT DIET. {Vinaya Texts, SBE, vol. xv||, p. 116 & HG., P.85 }

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