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भारत विकास में जैनों का योगदान !! Contribution of Jains in India's development !!

*देश की कुल जनसंख्या का १ प्रतिशत जैन समाज है, लेकिन देश के विकाश में उसका योगदान उल्लेखनीय है-
देश के कुल इन्कम टैक्स का २४ प्रतिशत जैन समाज भरता है| 
देश में होने वाले दान-दक्षिणा का ६२ प्रतिशत दान जैन समाज द्वारा दिया जाता है|
देश में संचालित कुल १६ हजार गोशालाओं में से १२ हजार गोशालायें जैन समाज के द्वारा संचालित होती हैं| 
देश भर में जैन तीर्थ एवं मंदिरों की संख्या ५०,००० से अधिक है| 
देश के शेयर ब्रोकरों में ४६ प्रतिशत जैन हैं| 
देश के अग्रणी समाचार पत्रों में से ८० प्रतिशत जैन समाज के लोगों के द्वारा चलाये जाते हैं| 
देश के कुल विकाश में २५ प्रतिशत योगदान जैन समाज का है| 

*भाषा और साहित्य विकाश के क्षेत्र में जैनों का योगदान:
जैन धर्म ने देश की भाषा के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जबकि बौद्ध और ब्राह्मण पाली और संस्कृत में प्रचार करते थे, जैन लोगों को उनकी भाषा में उपदेश देते थे। अधिकांश जैन साहित्य प्राकृत में लिखे गए थे।वृहत्तर साहित्य का निर्माण भाषा में भी किया गया था। उदाहरण के लिए, महावीर ने अर्ध मागधी नामक मिश्रित बोली में प्रचार किया ताकि क्षेत्र के लोग उनकी शिक्षाओं को समझ सकें। उनके शिक्षण, जिसे बाद में 12 भाषाओं में संकलित किया गया था शीर्षक के तहत श्रुतांग भी इसी भाषा में रचे गए थे। 

साहित्य में जैनियों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अपभ्रंश भाषा में है। यह साहित्य एक ओर शास्त्रीय भाषा संस्कृत और प्राकृत को जोड़ता है और दूसरी ओर आधुनिक भाषा।

जैनियों ने दक्षिण में कानारेस साहित्य को भी प्रभावित किया। यहाँ यह ध्यान दिया जा सकता है कि कुछ जैन कार्य संस्कृत भाषा में भी निर्मित किए गए थे। संस्कृत में निर्मित साहित्य में न केवल दार्शनिक कार्य शामिल हैं, बल्कि व्याकरण, अभियोगी, शब्दलेख और गणित जैसे विषय भी शामिल हैं। जैन साहित्य के प्रमुख विद्वान हेम चंद्र, हरि भद्र, सिद्ध सेना, पूज्य पाद थे। इस प्रकार जैन धर्म ने भारतीय भाषाओं और साहित्य को समृद्ध किया।

*स्वस्थ समाज का निर्माण में जैनों का योगदान:
जैन धर्म ने वर्ण व्यवस्था की बुराइयों को कम करने का पहला प्रयास किया। बाद का वैदिक समाज जाति व्यवस्था पर आधारित था। ऊंची जातियों के लोगों ने हमेशा निचली जातियों का शोषण किया। लेकिन जैन धर्म ने सभी जातियों के लोगों के साथ समान व्यवहार किया। इसके अनुयायियों, अपनी जातियों के बावजूद एक-दूसरे को भाई-बहन मानते थे। इस प्रकार जैन धर्म ने एक स्वस्थ समाज के विकास को प्रोत्साहित किया।

*जैनों का वास्तुकला में योगदान:
जैन कला और वास्तुकला ने भारतीय कला को भी सुशोभित किया। प्रारंभिक शताब्दियों में पत्थर की रेलिंग, सजे हुए द्वार, पत्थर की छतरियां, स्तंभों, मूर्तियों के साथ अपने संतों के सम्मान में स्तूपों का निर्माण किया गया था। सुंदर जैन चित्र मथुरा, बुंदेलखंड और उत्तरी मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं।
कर्नाटक में श्रवण बेलगोला और करकल में गोमतेश्वर नामक बाहुबली की मूर्ति अद्भुत जैन वास्तुकला का उदाहरण है। बाहुबली 57 फीट ऊंची प्रतिमा , जिसे ग्रेनाइट के एक द्रव्यमान से उकेरा गया था, जिसे 984 ई। में गंगा राजा, रचमल्ला के मंत्री चामुंडराय ने बनवाया था।
मध्यप्रदेश के भिलसा के पास, और महाराष्ट्र के एलोरा में उदयगिरि पहाड़ियों पर उनके राहत कार्यों और मूर्तियों के साथ जैन गुफाएं जैन वास्तुकला और मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जैनियों ने चट्टानों में काटे गए गुफा मंदिरों का भी निर्माण किया है, उड़ीसा में पाए जाने वाले हतीगुम्फा कवर को जैन वास्तुकला के अन्य उदाहरण मिलते हैं। जुन्नार और उस्मानाबाद।
तीर्थयात्रा के कई जैन केंद्र, जैसे, बिहार में पार्श्वनाथ हिल्स, पावापुरी और राजगिरि और काठियावाड़ में गिरनार और पालिताना में मंदिर और अन्य स्थापत्य स्मारक हैं। ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित राजस्थान के माउंट आबू में जैन मंदिर, जैन वास्तुकला में सर्वोच्च पूर्णता पर पहुंच गया।

*सार्वजनिक उपयोगिता की ओर अधिक ध्यान:
जैन धर्म के उपदेशों ने न केवल अहिंसा पर जोर दिया, बल्कि मानवता के लिए अधिक से अधिक सेवा पर जोर दिया। जैन धर्म के अनुयायियों ने सार्वजनिक उपयोगिता के लिए कई सराय, अस्पताल, स्कूल और अन्य संस्थान खोले और जिससे सार्वजनिक उपयोगिता कार्यों की भावना को प्रोत्साहन मिला।

*भारत की स्वतंत्रता में जैनों का योगदान:
हमने बिगुल बजाया आजादी का: स्वतंत्रता संग्राम में जैनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जैन धर्मावलम्बियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया तन,मन,धन से सहयोग दिया जैन धर्मावलंबियों के बलिदान को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नही किया जा सकता !!
* भारतीय राजनैतिक इतिहास की अविस्मरणीय घटना है १८५७ की जिसमे दो अमर जैन शहीद हुए ” श्री लाला हुक़ूमचन्द जैन’ और श्री अमर चंद बांठिया। 
* “श्रीमान वीर शहीद लाला हुकुमचंद जी जैन’ बहादुरशाह जफर के दोस्त लाला हुकमचंद जैन व उनके भतीजे फकीरचंद जैन को १९जनवरी १८५८, उनके मकान के सामने कृतम तरीके से फांसी दे दी गई।
* “श्रीमान वीर शहीद अमरचंद जी बांठिया’ जब १८५७ का समर जोरो पर था तब ग्वालियर नरेश के खजांची अमर शहीद अमरचंद जी बांठिया ने खजाना खोलकर आजादी के दीवानों की सहायता की। २२ जून १८५८ को को ग्वालियर में झूठेझूठेराजद्रोह के अपराध में आप को फांसी दे दी गई।
* “श्रीमान वीर शहीद मोतीचंद जी शाह’ जब अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसे नारे लग रहे थे उंस समय जो व्यक्ति सार्वजनिक मंचो से “औपनिवेशिक स्वराज्य’ की मांग रखते थे जिन्होंनेन्हों जेल में “१० उपवास’ किये थे आप को षड्यंत्र कारी बता फांसी पर लटका दिया गया।
* “श्रीमान वीर शहीद सिंघई प्रेमचंद जी जैन’ दिसम्बर १९३३ में पूज्य महात्मा गांधी जी का दमोह में आगमन हुआ आप गांधी जी का भाषण सुन देश भक्ति ऐसी जगी की आप “खादी’ के प्रचार में लग गये आप को जेल में जहर देकर छोड़ दिया मरने के लिये। * ” श्रीमान शहीद वीर सताप्पा टोपणणावर’ १६ वर्ष की उम्र में आपने असहयोग आंदोलन शुरू किया,कई बार जेल गए सिंह गर्जना के साथ अंग्रेजों को जबाब दिया और आप को गोली मार दी गई आप शहीद हो गए।
* “श्रीमान अमर शहीद वीर उदय चंद जैन’ आपका मानना था “भगतसिंह और चंदशेखर जी कभी पुलिस से नही डरे डरना कायरता है’ आप की सभा पर लाठीचार्ज हुआ आप शहीद हुए।
* ” श्रीमान वीर शहीद साबूलाल जैन जी बैसाखिया’ गढ़ाकोटा जिला सागर जिसमे बुंदेलखंड के हृदय स्थल आजादी की लड़ाई से अछूता नही रहा आप अपने ५ साथियो साथ तिरंगा झंडा लिए आगे बढे आप सभी ने यूनियन जेक निकालकर तिरंगा लगाने की कोशिश की सामने से धांय धांय गोलियां चली आप सभी शहीद हो गए।
* ” श्रीमती अमर शहीद कुमारी ज्यावती संघवी’ आप बाल उम्र में ही जुलूस का नेतृत्व कर रही थी पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े जिसमे आप शहीद हो गई।
* “श्रीमान अमर शहीद अण्णा पन्नावले’ आप १९४२ के आंदोलन में लड़े और मात्र १७ वर्ष की उम्र में आप शहीद हो गए।
* ” श्रीमान अमर शहीद मगनलाल ओसवाल जी’ ६ सितंबर १९४२ को इंदौर में एक जुलूस निकाला आप सबसे आगे “भारत माता की जय’,”अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगा रहे थे ’ पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलियां वर्षा दी आप शहीद हुए।
* “श्रीमान वीर अमर शहीद भूपाल अणसकुरे’ “असल आजादी के नींवनीं के पत्थर तो आप ही हैं आप को पुलिस द्वारा बर्बरता पूर्ण मारे जाने से आप शहीद हो गये।
* ” श्रीमान अमर शहीद कंधीलाल जैन’ १२ मार्च १९३० को अपना इतिहासिक दांडी मार्च प्रारंभ किया इस मार्च में गांधी जी द्वारा चुने ८९ अनुयायी थे सरकार ने नमक पर कर लगाकर दुगना कर दिया था मार्शल ला लागू हुआ खुलेआम मारा गया आप एक जुलूस में शहीद हो गये।
* खुशालचंदजी गोरावाला जैसे प्रसिद्ध विद्वानों ने भी जेल की कठिन यातनाएँ सहन की थी। 
* जैन समाज के प्रख्यात विद्वान पं. परमेष्ठीदास जी भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहते हुए जेल गये।
* पद्म श्री बाबूलाल जी पाटोदी समाज के सम्मानित और प्रतिभावान नेता तो रहे ही हैं, स्वतन्त्रता आंदोलन में १९३९ से ही आप सक्रिय हो गये थे और आपको भी अपने जीवन में अनेक बार जेल की दारुण यातनाएँ सहनी पड़ीं।
* २० वीं सदी के अग्रगण्य जैन विद्वानों में पं.फूलचंद जी शास्त्री का नाम आदर से लिया जाता है। वे भी ललितपुर में गिरफ्तार हुए और जेल गये। वे विदेशी वस्त्र एवं सामग्रीयों का उग्रतापूर्वक बहिष्कार करते थे स्वयं देशी वस्त्र पहनते थे|
* इन्दौर के तत्कालीन मध्यभारत के मुख्यमंत्री रहे मालवा के गांधी के नाम से प्रसिद्ध श्री मिश्री लाल जी गंगवाल भैय्याजी ने अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया तथा जेल यात्राएँ भी की।
* खास बात यह रही कि जैन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने जेल में रहकर तथा अनेक यातनाएँ सहन करते हुए भी अपने जैनत्व के संस्कार को नहीं छोड़ा। सनावद के कमलचंद जैन एडवोकेट का देवदर्शन बिना भोजन नहीं करने का नियम था। पर्यूषण पर्व के दिनों में वह जेल में थे, उन्होंने अनशन कर दिया तथा जेल में ही प्रतिमाजी लाने की अनुमति मिली। वे प्रतिदिन अभिषेक पूजन के साथ दोपहर को तत्वार्थसूत्र का पाठ करते और संध्या को सामायिक अपने अन्य जैन साथियों के साथ करते थे। भोजन भी अपने हाथों से बनाकर शुद्ध भोजन दिन में एक बार करते थे।
* इसी तरह १९४३ में इन्दौर के सेण्ट्रल जेल में म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मिश्रीलाल गंगवाल भैयाजी तथा पद्मश्री बाबूलालजी पाटोदी ने भी जेल में ही रहकर सारी दैनिक क्रिया पर्व के अनुसार करते हुए तथा शुद्ध भोजन करते हुए पर्व मनाया।
* महान क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी ने बेलूर जेल में ५६ दिनों तक निराहार व्रत करते हुए दर्शन— पूजन के लिये जिनेन्द्र प्रतिमा नहीं दिये जाने का विरोध किया।
* खजुराहो के निकट गाँव में पैदा हुए शहीद छोटेलालजी जैन के साथ जब जेल में खाने पीने की जबरदस्ती की गई तो उन्होंने अनशन करते हुए अपना दृढ़ निश्चय का सिंहनाद किया कि जब तक छना पानी और शुद्ध भोजन नहीं मिलेगा तब तक एक बूँद भी अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगा। अंतत: शासन को झुकना पड़ा।
* जबलपुर के पनागर में जन्मे सिंघई जवाहरलाल जैन का वाक्या भी कुछ ऐसा ही है। पर्यूषण पर्व में वे अपने ४०—५० जैन साथियों सहित जेल में थे, उन्होंने जेल में इस बात को लेकर सत्यग्रह किया कि पर्व के दिनों में शुद्ध तथा अपने हाथ से बना शुद्ध भोजन ही ग्रहण करेंगे, जिसमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई और दसों दिन पर्व में पूजन भजन के साथ सात्विक भोजन ही किया।
* पन्ना दमोह क्षेत्र से सांसद रहे प्रसिद्ध सामाजिक राजनीतिक पदों को सुशोभित करने वाले श्री डालचंद जैन ने स्वतंत्रता आंदोलन में शरीक उन सभी जैन सेनानियों की जेल में शुद्ध भोजनादि की व्यवस्था की।
* आचार्य नेमिसागर महाराज ने भी गृहस्थ अवस्था में स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय सहयोग दिया था। ग्यारह माह तक लाहौर जेल में रहे, जेल की अशुद्ध रोटी नहीं खाई। कई दिनों तक उपवास किया। अंत में शुद्ध भोजन की व्यवस्था हुई।
* इसी तरह क्षुल्लक पदमसागर जी महाराज ने भी गृहस्थ अवस्था में स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय सहयोग दिया। उन्हें बड़ौदा में १४४ धारा तोड़ने के कारण जेल जाना पड़ा।
* जैन दर्शन के उद्भट विद्वान पं.बंशीधर जी व्याकरणाचार्य भी इस मातृभूमि को स्वतंत्रता दिलाने में पीछे नहीं रहे। जवानी की शुरुआत में ही आप देश सेवा के यज्ञ में सक्रिय रहे। सागर, नागपुर,अमरावती आदि जेलों की यातनाओं में भी उनके जैनत्व के संस्कार अपराजेय ही रहे।
* जैन जाग्रति का शंखनाद करने वाले तथा अनेक जैन पत्र पत्रिकाओं का संपादन करने वाले श्री अयोध्या प्रसाद गोयलीय के पिता श्री रामशरणदास जी ने भी जेल में रहकर ६ माह तक केवल नमक को पानी में घोलकर रोटी इसलिये खाई, क्योंकि जेल में मिलने वाली सब्जी में प्याज रहता है था, उनके मौन सत्याग्रह की आखिर में विजय हुई तथा बिना प्याज की सब्जी इनके लिये अलग से बनने की जेल अधिकारियों ने मंजूरी दी।
*  जैन पत्रकारिता के पितामह बाबू ज्योतिप्रसाद जैन द्वारा ‘‘जैन प्रदीप’’ में १९३० में ‘‘भगवान महावीर और गांधीजी’’ नामक उर्दू में छपे लेख से अंग्रेज इतना डर गये थे कि उन्होंने इस समाचार पत्र की सारी प्रतियाँ ही जब्त कर ली थी और इसके प्रकाशन पर रोक लगा दी गई थी।
* प्रसिद्ध साहित्यकार कल्याण कुमार ‘शशि’ तथा श्यामलाल पाण्डवीय की पुस्तक और पत्रिका भी जब्त कर ली गई थी। इस तरह अनेक जैन पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से जैन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी के यज्ञ में तन—मन—धन, साहित्य तथा क्रांतिकारी विचारों से समर्पण भाव से सहयोग दिया।
* ‘‘अत्याचार कलम मत सहना, तुझे कसम ईमान की’’ जैसी क्रांतिकारी रचना के कारण प्रसिद्ध हे कल्याण कुमार ‘शशि’ जो कभी विद्यार्थी नहीं रहे, कोई डिग्री जिन्होंने प्राप्त नहीं की, उन पर एक अंग्रेज एस.पी. पर बम फैकने के अपराध में रावलपिण्डी और कश्मीर की जेलों में यातना सहना पड़ी।
इसके आलावा अनेक जैनों में भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया-

*अब्बक्का रानी* : 
एक जैन वीरांगना जिन्होंने पोर्तुगीजों को पराभूत किया !
Rani Abbakka – Jain Freedom Fighters
“रानी ऑफ़ उल्लाल से संबोधित किया जाता था”
अब्बक्का रानी अथवा अब्बक्का महादेवी तुलुनाडूकी रानी थीं जिन्होंने सोलहवीं शताब्दीके उत्तरार्ध में पोर्तुगीजों के साथ युद्ध किया । वह चौटा राजवंशसे थीं जो मंदिरों का शहर मूडबिद्रीसे शासन करते थे । बंदरगाह शहर उल्लाल उनकी सहायक राजधानी थी ।चौटा राजवंश मातृसत्ताकी पद्धतिसे चलनेवाला था, अत: अब्बक्काके मामा, तिरुमला रायने उन्हें उल्लालकी रानी बनाया । उन्होंनेने मैंगलोरके निकटके प्रभावी राजा लक्ष्मप्पा अरसाके साथ अब्बक्काका विवाह पक्का किया । बादमें यह संबंध पोर्तुगीजों हेतु चिंताका विषय बननेवाला था । तिरुमला रायने अब्बक्काको युद्धके अलग-अलग दांवपेचोंसे अवगत कराया ।

*भामाशाह कवाडिया*
Bhamashah Kavadia – Jain Freedom Fighters
भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़ राज्य में 29 अप्रैल, 1547 को हुआ था| इनके पिता का नाम भारमल था, जिन्हें राणा साँगा ने रणथम्भौर के क़िले का क़िलेदार नियुक्त किया था| कालान्तर में राणा उदय सिंह के प्रधानमन्त्री भी रहे| भामाशाह बाल्यकाल से ही मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे थे| भामाशाह दानवीर के साथ काबिल सलाहकार, योद्धा, शासक व प्रशासक भी थे| महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून, 1576 ई.) हार चुके थे, लेकिन इसके बाद भी मुग़लों पर उनके आक्रमण जारी थे |

*श्री वीरचंद राघवजी गांधी*
Virchand Gandhi – Jain Freedom Fighters
जैन धर्म और समाज में हर कालखण्ड में अनेक सन्त, विचारक, विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, षिक्षाविद्, वैज्ञानिक, वीर, दानवीर, शासक, प्रषासक, अर्थषास्त्री, उद्योगपति आदि विविध क्षेत्रों से जुड़े विषिष्टजन हुए हैं। इन विषिष्टजनों ने समाज, देष और दुनिया को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया। ऐसे ही प्रभावित करने वाले महानुभावों में जैन धर्म-दर्षन के विद्वान श्री वीरचन्द राघवजी गांधी भी हैं। यह एक तथ्य है कि जैन धर्म के अनेक ऐतिहासिक महापुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आज भी समय और उपेक्षा की धुंध छाई हुई है ।

*सेठ लाला हुकुमचंद जैन*
हुकुमचंद जैन का जन्म 1816 में हांसी (हिसार) हरियाणा के प्रसिद्ध कानूनगो परिवार में श्री. दुनीचंद जैन के घर हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा हांसी में हुई थी। जन्म जात प्रतिभा के धनी हुकुमचंद जी की फ़ारसी और गणित में रुचि थी। अपनी शिक्षा व प्रतिभा के बल पर इन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के दरबार में उच्च पद प्राप्त कर लिया और बादशाह के साथ इनके बहुत अच्छे सम्बन्ध हो गये ।

*बाबू मूलचंद जैन*
(20 August 1915 – 12 September 1997)
बाबू मूलचंद जैन को अक्सर “गाँधी ऑफ़ हरयाणा” के नाम से जाना जाता था| मूलचंदजी ने महात्मा गाँधी के साथ उनके कही सारे आंदोलन में हाथ बटाया था| वे अपने “सिविल डिसओबीडीएंस मूवमेंट”, “क्विट इंडिया मूवमेंट”, “पोस्ट इंडिपेंडेंस इमरजेंसी” आंदोलन के लिए कही बार जेल भी जा चुके थे| पर इन्होने हिम्मत न हारते हुए, साहस करके अपने और बाकी देशवासियों के हक के लिए लड़ा |

*लक्ष्मी चंद जैन*
लक्ष्मी चंद जैन(1925–2010) ने “इंडियन फ्रीडम मूवमेंट” में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था, जो काफी प्रभावित था| उनको १९८९ में लोक सेवा के लिए “रेमन मैगसेसे पुरस्कार” मिला था| २०११ में उनको “पद्मा विभूषण” के लिए चुना गया था, पर उनके परिवार ने वह पद लेने से इनकार कर दिया था , क्यूंकि मूलचंदजी के विचार राजकीय सम्मान के खिलाफ थे|

*जवेरचंद मेघानी*
28 August 1897 – 9 March 1947
जवेरचंद मेघानी एक बहुत ही प्रसिद्द कवी और स्वतंत्रता सेनानी थे|इनके हर कविता में देशभक्ति की छाप दिखाई देती थी|इसके चलते महात्मा गाँधी ने इनको “राष्ट्रीय शायर” के नाम से नवाज़ा|

*हंसा जीवराज मेहता*
हंसा जीवराज मेहता (1897–1995) एक सुधारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, स्वतंत्रता कार्यकर्ता, लेखक थी |

*दौलत मल भंडारी*
दौलत मल भंडारी भारत में राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय, पहली लोकसभा के एक सदस्य और एक स्वतंत्रता सेनानी थे।1955 से 1952 के लोकसभा के सदस्य थे। भंडारी ने आजादी की लड़ाई में सक्रिय भाग लिया| 1942 ,जयपुर में उन्होंने ‘आजाद मोर्चा ” का गठन किया और वहा सत्यग्रह किया|उन्हें ९ महीने के लिए जेल में दाल दिया गया था|भारत के विभाजन के दौरान उन्होंने सिंध और पश्चिमी पंजाब से शरणार्थियों के पुनर्वास में योगदान दिया।

*सेठ श्री जोरावरमल बापना*
19 वीं सदी में एक और देशभक्त सेठ जोरावर बाफना (जैसलमेर के प्रसिद्ध “पटवा हवेली”) के मालिक थे, जिन्होंने ब्रिटिश और स्थानीय राजपूत राजाओं के बीच प्रमुख राजनयिक उदयपुर, जोधपुर और इंदौर जैसे रियासतों के महत्वपूर्ण मुद्दों को निपटाने में अहम भूमिका निभाई थी| इन्होने राजस्थान और अन्य कई जगहों पे जैन मंदिर का निर्माण किया था|

डॉ. कपूरचंद जैन एवं डॉ. श्रीमती ज्योति जैन ने इस संबंध में खोजबीन की है और उन्होंने भरसक प्रयत्न किया है उन जैन वीरों को खोजने का जिन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी आहुति दी है। प्राच्य श्रमण भारती मुजफ्फरनगर ने उनके द्वारा संकलित इस इतिहास को‘‘ स्वतंत्रता संग्राम में जैन’’ नामक पुस्तक को प्रकाशित किया है।

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