मैंने हाल ही में समाचार पत्रों में इरोड, तमिलनाडु में एक कम्पनी के संबंध में पढ़ा था, जो सौ प्रतिशत शाकाहारी अंडों का उत्पादन करने वाली है। उस लेख का शीर्षक था ‘अब अंडे शाकाहारी होंगे! वे लोग, जो पहले माँसाहारी थे और अब शाकाहारी बनना चाह रहे हैं और जिन्होंने माँस-मछली खाना छोड़ दिया है, लेकिन अंडे खाना नहीं छोड़ पा रहे हैं, उनके लिए यह एक अच्छी खबर है। साथ ही, उन शाकाहारियों के लिए भी, जो अंडे खाना पसंद करते हैं। भारत की यह अग्रणी अंडा विनिर्माता और निर्यातक कापनी आने वाले वर्ष में घरेलू बाजार तथा निर्यात, दोनों के लिए १०० प्रतिशत शाकाहारी अंडे लाएगी। कंपनी पहले से ही १०० प्रतिशत शाकाहारी अंडे के पाउडर और अंडे की जर्दी से बने पदार्थ को २७ देशों को निर्यात कर रही है। इसलिए अगली बार जब भी आप अंडे वाली पेस्ट्री खाएँ, ग्लानि न महसूस करें। 

दरअसल, मुर्गियों को पोल्ट्री फार्मों पर पाला जाता है और जब वे थोड़ी बड़ी हो जाती है, तब उन्हें जबरदस्ती अंडे देने के लिए बाध्य किया जाता है। एक वर्ष में ३०० अंडे तक। शाकाहारी अंडे परोसने का दावा करने वाली कापनी के अनुसार, ‘दूसरी कंपनियों और हमारी कापनी में अंतर यह है कि जहाँ अन्य पोल्ट्रियाँ अपनी मुरगियों को मछली वाला भोजन खिलाती हैं, वहीं पर हम उन्हें १.५ मिलियन सोया पाउडर खिलाते हैं। इसलिये इनके अंडे पूणर्त: शाकाहारी हैं। 

लेकिन गौर करने की बात यह है कि इसी कंपनी के अंडों को पहले यूरोपीय यूनियन द्वारा लेने से मना कर दिया गया था, क्योंकि उनके प्रत्येक अंडे में अनुमान से अधिक एंटीबायोटिक था। बहरहाल, जब मैंने इस विज्ञापन को पढ़ा, तो इसके संबंध में खोज करने के लिए इंटरनेट खंगाला। पता लगा कि पोल्ट्रियाँ इन्हें शाकाहारी कहती हैं, क्योंकि मुरगियों को प्राकृतिक दाने और पोषक तत्व खाने को दिए जाते हैं। मुरगियों को पिजरों में नही रखा जाता है। उनके परिसर में ही पशुचिकित्सक होते हैं और अंडे की पैकेजिंग रिसाइकिल की गई प्लास्टिक की थैलियों में होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या तब भी अंडे शाकाहार हैं? 

सबसे स्पष्ट उत्तर तो यही है कि अंडा मुर्गी से निकलता है। यह किसी बैगन के पौधे या फिर आम के पेड़ से नहीं निकलता। यह पशु के यौन अंगों से निकलता है। इसलिए अंडा शाकाहार नहीं हो सकता। मुर्गियाँ अंडे क्यों देती है? प्रज्नान करने के लिए। 

सच्चाई यही है कि अंडा मुरगियों के मासिक धर्म का रक्त होता है। यदि उन्हें सेया जाए, तो उनसे मुरगा-मुरगी की उत्पत्ति होती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो अंडे वाला मासिक धर्म का रक्त मुरगी के शरीर द्वारा उसी प्रकार निकालकर पेक दिया जाता, जिस प्रकार महिलाएँ अपने प्रजनन न हो सकने वाले रक्त को प्रत्येक माह निकालकर पेंक देती हैं। इसलिए इन दलीलों के आधार पर अंडे शाकाहार नहीं हो सकते। अंडा खाने वाले कुछ शाकाहारियों का तर्व है कि अंडे दो प्रकार के होते हैं, जिनसे मुरगी पैदा हो सके और जिनसे नहीं हो सके। चूँकि शाकाहारी अंडा उद्योग बच्चे पैदा न कर सकने वाले अंडों का उत्पादन करता है। इसलिए ये शाकाहार हैं। एक तर्व यह भी है कि चूँकि इनमें जीवन नहीं होता, अत: ये अंडे शाकाहार की श्रेणी में आते हैं। 

लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है। एक बार परिपक्व हो जाने के पश्चात् मुरगियाँ अंडा देना प्रारंभ कर देती हैं। सभी अंडे बच्चे पैदा कर सकने वाले होते हैं और मुरगियाँ दोनों प्रकार के अंडे देती हैं। वास्तव में, अंडों से बच्चे पैदा कर सकने की संभावना एक सप्ताह तक होती है और इस अवधि में उनमें से सभी बच्चे पैदा कर सकने वाले बन जाते हैं। बच्चे पैदा कर सकने वाले होने के पश्चात् उन्हें पकाना तथा खाना काफी कठिन होता है, क्योंकि तब उसके छिलके का रंग तथा मोटाई बदल जाती है। इसलिए पोल्ट्री फार्म चलाने वाले व्यवसायी तत्काल अंडों को बेच देते हैं और जो पोल्ट्री फार्म व्यवसायी मुरगियों को बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे उन्हीं अंडों को से लेते हैं और फिर मुरगियों को बेच देते हैं। अंडे को शाकाहार साबित करने के लिए एक और तर्व यह भी दिया जाता है कि यदि मुरगियाँ केवल शाकाहारी भोजन खाती हैं, तो अंडा शाकाहारी हुआ। इस तर्व में भी सच्चाई नहीं है, क्योंकि सभी पोल्ट्रियाँ अपनी मुरगियों को हड्डीयाँ, रक्त, मल, मृत मुर्गों का माँस, मछली तथा अन्य पशुओं की गंदगी खिलाती हैं। 

ऑल इंडिया पोल्ट्री फीड्स ऐंड एग प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन कहता है कि अधिकांश पोल्ट्री मुरगियों के लिए मछली के भोजन का ही उपयोग करती हैं, क्योंकि सोया भोजन महंगा है। फिर यदि यह भी मान लिया जाए कि मुरगियों को केवल अनाज ही दिया जाता है, तो भी क्या वे सब्जी हो जाएंगी। एक भैंस घास खाती है। क्या उसका माँस शाकाहारी है? क्या मुरगे के माँस को शाकाहारियों द्वाया खाया जाता है? हत्या करना अवैध तथा अनैतिक है। इस दुनिया में कई सारे लोग हत्या करते हैं, तो क्या उसे वैध तथा नैतिक मान लिया जाए। यह सही है कि अनेक देशों में एसे कानून हैं, जो विज्ञापन देने वालों को अपने उत्पाद की गुणवत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर बनाने की छूट देते हैं, किन्तु झूठ बोलने की आवश्यकता नहीं है। और अंडा खाने वाले जो शाकाहारी अपने को भ्रम में रखे हुए हैं, उन्हें सबसे पहले उन तथ्यों को जानना चाहिए। कि किस तरह मुरगी एक अंडा देती है।


(दिनाँक २४ जून २००८ के दैनिक अमर उजाला समाचार पत्र-मेरठ संस्करण के पृष्ठ क्रमांक १६ से साभार) —श्रीमती मेनका गाँधी (पूर्व केन्द्रीय मंत्री)