आदिनाथ (ऋषभदेव) भगवान का विस्तृत एवं प्रमाणिक जीवन परिचय
प्रस्तावना
इस जम्बूद्वीप में, मेरु पर्वत के पश्चिम दिशा में स्थित विदेह क्षेत्र के अंतर्गत एक अत्यंत रमणीय और दिव्य देश है, जिसका नाम गंधिल देश बताया गया है। यह देश स्वर्ग के समान शोभायमान है, जहाँ सदा ही श्री जिनेन्द्र भगवान रूपी सूर्य का प्रकाश विद्यमान रहता है। इसी कारण वहाँ कभी भी मिथ्यादृष्टि का उदय नहीं होता — यह स्थान pure spirituality का प्रतीक माना गया है।
गंधिल देश के मध्य भाग में रजतमय विजयार्ध पर्वत स्थित है। इसी पर्वत की उत्तर श्रेणी में अलकापुरी नामक एक श्रेष्ठ नगरी थी, जहाँ के राजा थे अतिबल — एक पराक्रमी विद्याधर। उनकी धर्मपरायण और पतिव्रता रानी मनोहरा देवी से एक अत्यंत भाग्यशाली पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम महाबल रखा गया।
राजा अतिबल का वैराग्य और महाबल का राज्याभिषेक
एक समय भोगों से विरक्त होकर महाराज अतिबल ने विधिपूर्वक अपना सम्पूर्ण राज्य पुत्र महाबल को सौंप दिया और स्वयं अनेक विद्याधरों के साथ वन गमन कर दीक्षा ग्रहण कर ली। राजा महाबल के चार प्रमुख मंत्री थे — स्वयंबुद्ध, महामति, संभिन्नमति और शतमति। इनमें से स्वयंबुद्ध मंत्री सम्यग्दृष्टि थे, जबकि शेष तीन मिथ्यादृष्टि मतों के अनुयायी थे।
धर्म-विवाद और स्याद्वाद की विजय
एक अवसर पर राजा महाबल के जन्मोत्सव में भव्य समारोह आयोजित था। उसी समय स्वयंबुद्ध मंत्री ने अवसर पाकर जैन धर्म का गूढ़ और logical उपदेश दिया। इसके प्रत्युत्तर में महामति ने चार्वाक मत के अनुसार जीव के अस्तित्व को नकारा, संभिन्नमति ने विज्ञानवाद के माध्यम से केवल ज्ञान को ही सत्य बताया, और शतमति ने शून्यवाद का समर्थन किया।
इन तीनों के एकांगी दृष्टिकोण का स्वयंबुद्ध मंत्री ने न्याय और आगम के आधार पर खंडन किया तथा स्याद्वादमय अहिंसा धर्म की स्थापना कर राजा को अत्यंत प्रसन्न किया। यह प्रसंग आज भी intellectual clarity और सम्यक् दृष्टि का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
चारण मुनियों का उपदेश और भविष्यवाणी
किसी समय स्वयंबुद्ध मंत्री सुमेरु पर्वत पर स्थित अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना हेतु गए। वहाँ उन्हें विदेह क्षेत्र से पधारे दो महान चारण मुनि — आदित्यगति और अरिंजय — मिले। मंत्री के प्रश्न पर आदित्यगति मुनि ने अवधिज्ञान से बताया कि राजा महाबल भव्य जीव हैं और दसवें भव में भरत क्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर के रूप में जन्म लेंगे।
महाबल का संलेखना और देव भव
स्वप्न-फल और पूर्वभव जानकर राजा महाबल ने अपने पुत्र अतिबल को राज्य सौंपकर सिद्धकूट चैत्यालय में संलेखना धारण की। धर्मध्यानपूर्वक देह त्याग कर वे ईशान स्वर्ग में ललितांग नामक देव बने। आगे अनेक भवों में पुण्य, दान और सम्यग्दर्शन के प्रभाव से उनकी आत्मा क्रमशः उच्चतम अवस्थाओं को प्राप्त करती गई।
ऋषभदेव का गर्भावतार और जन्म कल्याणक
अंततः सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर भगवान ऋषभदेव ने माता मरुदेवी के गर्भ में अवतार लिया। गर्भावतरण से पूर्व माता ने सोलह शुभ स्वप्न देखे, जिनका फल तीर्थंकर जन्म के रूप में बताया गया। चैत्र कृष्ण नवमी के दिन प्रभु का जन्म हुआ, जिसे पूरे ब्रह्माण्ड ने cosmic celebration के रूप में अनुभव किया।
इन्द्रों द्वारा सुमेरु पर्वत पर 1008 कलशों से क्षीराभिषेक किया गया और प्रभु का नाम ऋषभदेव रखा गया।
विवाह, संतान और सामाजिक व्यवस्था की स्थापना
युवावस्था में प्रभु का विवाह यशस्वती एवं सुनन्दा से हुआ। उनसे भरत चक्रवर्ती, बाहुबली सहित 101 पुत्र और ब्राह्मी-सुन्दरी नामक दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। प्रभु ने स्वयं ब्राह्मी को लिपि विद्या और सुन्दरी को गणित विद्या का उपदेश देकर women education की नींव रखी।
कल्पवृक्षों के लोप के बाद प्रभु ने असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प — इन six core professions का उपदेश दिया तथा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — तीन वर्णों की व्यवस्था की। इसी कारण वे आदिब्रह्मा, प्रजापति और विश्वकर्मा कहलाए।
वैराग्य, दीक्षा और तप
नीलांजना अप्सरा के नृत्य के मध्य निधन से प्रभु को गहरा वैराग्य हुआ। भरत को राज्य सौंपकर प्रभु ने सिद्धार्थ वन में वटवृक्ष के नीचे पंचमुष्टि केशलोंच कर दीक्षा ली। छह माह का योग और एक वर्ष 39 दिन के पश्चात हस्तिनापुर में श्रेयांस कुमार द्वारा इक्षुरस का प्रथम आहार हुआ — जिसे आज अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है।
केवलज्ञान, समवसरण और निर्वाण
हजार वर्षों के कठोर तप के बाद फाल्गुन कृष्ण एकादशी को प्रभु को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। विशाल समवसरण में 84 गणधर, हजारों मुनि-आर्यिकाएँ और असंख्य जीवों ने धर्मोपदेश सुना।
अंततः कैलाश पर्वत पर माघ कृष्ण चतुर्दशी को प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया और सिद्धलोक में विराजमान हुए।
आज की youth के लिए आदिनाथ भगवान का संदेश
आज के समय में आदिनाथ भगवान हमें सिखाते हैं:
- distraction से दूर रहकर focus develop करना
- कम में संतोष और clarity खोजना
- बाहरी achievement से ज़्यादा inner growth पर ध्यान देना
उनका जीवन यह साबित करता है कि:
सच्ची freedom, self-discipline से आती है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
1. बालक ऋषभदेव कहाँ से आए थे?
बालक ऋषभदेव का अवतरण सर्वार्थसिद्धि विमान से हुआ था। वहाँ से च्युत होकर उन्होंने माता मरुदेवी के गर्भ में प्रवेश किया।
2.तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रचलित नाम कौन-कौन से हैं?
भगवान ऋषभदेव को आदिनाथ, वृषभनाथ, आदिब्रह्मा, प्रजापति, पुरुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है।
3. मुनि ऋषभदेव को दीक्षा के कितने समय बाद आहार प्राप्त हुआ था?
भगवान ऋषभदेव को दीक्षा के 1 वर्ष 39 दिन बाद प्रथम आहार प्राप्त हुआ था।
4. तीर्थंकर ऋषभदेव के यक्ष और यक्षिणी के नाम क्या हैं?
भगवान ऋषभदेव के यक्ष का नाम गौमुख तथा यक्षिणी का नाम चक्रेश्वरी देवी है।
5. आदिनाथ भगवान को प्रथम तीर्थंकर क्यों माना जाता है?
क्योंकि उन्होंने जैन धर्म के मोक्ष मार्ग को पुनः स्थापित किया और मानव समाज को धर्म एवं जीवन-व्यवस्था का मार्ग दिखाया।
6. आदिनाथ भगवान और ऋषभदेव क्या एक ही हैं?
हाँ, आदिनाथ भगवान को ऋषभदेव के नाम से भी जाना जाता है। दोनों नाम एक ही तीर्थंकर के हैं।
7. राजा ऋषभदेव के कौन से पुत्र सबसे पहले मोक्ष गए थे?
राजा ऋषभदेव के पुत्रों में अनंतवीर्य अथवा बाहुबली (दो मत प्रचलित हैं) सबसे पहले मोक्ष को प्राप्त हुए।
8. नारी शिक्षा के प्रथम उद्घोषक कौन थे?
राजा ऋषभदेव को नारी शिक्षा का प्रथम प्रवर्तक माना जाता है।
9. तीर्थंकर ऋषभदेव के पाँच कल्याणक कौन-कौन सी तिथियों में हुए?
गर्भ कल्याणक – आषाढ़ कृष्ण द्वितीया
जन्म कल्याणक – चैत्र कृष्ण नवमी
दीक्षा कल्याणक – चैत्र कृष्ण नवमी
ज्ञान कल्याणक – फाल्गुन कृष्ण एकादशी
मोक्ष कल्याणक – माघ कृष्ण चतुर्दशी
10. राजा ऋषभदेव ने कौन-कौन सी वर्ण व्यवस्था स्थापित की थी?
राजा ऋषभदेव ने क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — इन तीन वर्णों की व्यवस्था स्थापित की थी।
11. भगवान ऋषभदेव की दीक्षा स्थली, दीक्षा वन और दीक्षा वृक्ष का नाम क्या था?
दीक्षा स्थली – प्रयाग
दीक्षा वन – सिद्धार्थ वन
दीक्षा वृक्ष – वट वृक्ष
12. तीर्थंकर ऋषभदेव के मुख्य गणधर, मुख्य गणिनी और मुख्य श्रोता कौन थे?
मुख्य गणधर – ऋषभसेन
मुख्य गणिनी – ब्राह्मी
मुख्य श्रोता – भरत चक्रवर्ती
13. तीर्थंकर ऋषभदेव का तीर्थकाल कितने वर्षों तक रहा?
भगवान ऋषभदेव का तीर्थकाल 50 लाख कोटि सागर + 1 पूर्वांग प्रमाण रहा।
14. ऋषभदेव को केवलज्ञान कहाँ और किस वृक्ष के नीचे हुआ था?
भगवान ऋषभदेव को शकटावन (पुरिमतालपुर) में वट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
15. तीर्थंकर ऋषभदेव के कितने गणधर थे?
भगवान ऋषभदेव के कुल 84 गणधर थे।
16. ऋषभदेव के समवसरण में कितने मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ थीं?
समवसरण में —
84,000 मुनि
3,50,000 आर्यिकाएँ
3,00,000 श्रावक
5,00,000 श्राविकाएँ उपस्थित थीं।
17. तीर्थंकर ऋषभदेव ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध कब और किसके पादमूल में किया?
पूर्व के तीसरे भव में, वज्रनाभि चक्रवर्ती की पर्याय में रहते हुए, उन्होंने अपने पिता वज्रसेन तीर्थंकर के समवसरण में दिगम्बरी दीक्षा लेकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था।
18. तीर्थंकर ऋषभदेव की आयु और ऊँचाई कितनी थी?
भगवान ऋषभदेव की आयु 84 लाख पूर्व तथा ऊँचाई 500 धनुष बताई गई है।
🔗 Related Articles on Jainism
This section introduces the core concepts of Jain Dharma, its worldview, philosophy and spiritual way of life in a clear and authentic manner.