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मन की तृष्णा


ज्ञान मन को नियंत्रित करता है। मन ज्ञान को अज्ञान बनाने का प्रयत्न करता है। मन की तृष्णा ज्ञान के अंकुश से ही समाप्त होती है। मन भोग में सुख की कल्पनायें संजोता है। मन देह सुख की चिता पर सुलाता है। पद और पदार्थों में रमना मन की नियति है। मृत्यु को भुलाकर मौत के मुख में ले जाना मन का काम है। मनुष्य जितना अपने पूर्वकृत कर्म से दुःखी नहीं, उतना अपने मन के छलियापन से दुःखी है। इस मन के आकाश में ज्ञान का उड़ान भरना ही अज्ञान है।

मन की चंचलता को समाप्त करने के लिये हमें जप, तप, स्वाध्याय, स्तोत्र, भावनाओं का चितवन नियमित करना होगा। हम जितने-जितने धर्म क्रियाओं से जुड़ते जायेंगे, उतने-उतने ही मानसिक रूप से स्वस्थ होते जायेंगे। जप करते समय हमें यह विचारना होगा, कि हमें पूर्ण शांति मिल रही है। ऐसा विचार इसलिये करना है जिससे मन अशुभ में आनन्द होने का संदेश न दे पाये। जप करने से जहाँ विचारों में निर्मलता आती है, वहीं भावनायें भी चमत्कारी होती जाती हैं। जिस व्यक्ति के विचार निर्मल हैं, यदि वह प्रभु नाम के मंत्र से अपनी भावनाओं को मंत्रित करता है, तो वह भावनायें ही औषधि का काम करती हैं। जबकि अशुभ विचारों से भरा हुआ चित्त बीमारियों को आमंत्रण देता है।

तप के माध्यम से उन अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है, जो हमें मानसिक, वाचिक और कायिक रूप से रुग्ण करने का कार्य करते हैं। तप के अभाव में सत्ता में स्थित ये कर्म, योग्य समय पर उदय में आकर मनुष्य को विक्षिप्त करते हैं। इसलिये जप की सार्थकता के लिये तप का होना भी अनिवार्य है। स्वाध्याय करने से ज्ञान का विकास होता है। ज्ञान के विकास से मन की उद्दण्डतायें हासता को प्राप्त होती हैं। ज्ञान के द्वारा मन की विपरीतता को जाना जा सकता है। मन की विपरीतता को जानकर जप-तप-स्तुति के माध्यम से संतुलित जीवन जीने की दिशा में एक कारगर व सार्थक कदम उठाया जा सकता है।


Youtube/ Jinagam Panth Jain Channel

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