भावलिंगी संत

प.पू. गुरुदेव को "भावलिंगी संत" क्यों कहते हैं ? 

     

        वर्तमान काल के यशस्वी काव्यपुरोधा, शब्द सौष्ठवाधिपति, अक्षरधाम अलंकार जिन्होंने मात्र तन से ही नहीं अपितु चेतन से भी श्रामण्य सजगता के साथ दिगम्बरत्व की त्रिकाल पूज्य तीर्थेश प्रवृज्या को धारण किया है ऐसे निजांभिनंदी स्वगत तत्वध्याता जीवन रहस्यों को यथार्थता की कसौटी पर खरा उतरने वाला "जीवन है पानी की बूँद" महाकाव्य के सृजेता अनेकानेक महानग्रंथों के प्रणेता, जिनकी वाणी में मिथ्यात्व का खण्डन एवं सुतत्व स्वरूप का सृजन होता है ऐसे भावाभिराम भावीअरिहंत  श्री मद्आचार्यदेव भावलिंगी संत श्री विमर्शसागर जी महाराज ।
       अहो जिसके जीवन की विषमताओं के प्रति प्रतिकूलता तथा सुखोपलीनता पर आकुलता का नाद ना होता हो, जिसे परत्व से परे दृष्टि प्राप्त हुयी हो जिसने न सिर्फ तन पर अपितु भावों पर भी दिगम्बरत्व का प्रस्फुटन कर लिया हो ऐसे श्रमणाचार्य जिन्हें देहानुराग की जगह आत्मानुराग से अनुराग हो जिनके निश्छलभावों की निर्दोष झलक तन पर भी उतर कर अठखेलियाँ करती हो, ऐसे महामुमुक्षुत्व को आत्मपरिणति पर झंकृत करने वाले समीचीन तीर्थंकर लिङ्ग को धारण करने वाले अर्हद्योगी को "भावलिंगी"  ना कहा जाये तो और क्या कहा जाये? विद्वतजनों से आशा है कि "भावलिंगी" अलंकरण से श्रेष्ठ अलंकरण जो सम्प्रतिकाल में हम उपयोग कर सकें तो कृपया हमें अवगत करायें।
      कई-कई लोग बोलते हैं कि गुरुदेव स्वयं को "भावलिंगी" क्यों नहीं कहते ?
मित्र ये तो बताओ कि भगवान तीर्थेशों की अनादिकालीन परम्परा में किस तीर्थंकर की देशना में किस तीर्थंकर ने स्वयं को तीर्थंकर कहा है। हमारी मान्यता श्रुत सिद्धांतता ने उन्हें तीर्थंकर घोषित किया है, और फिर अनंत भावलिंगियों में ऐसे कौन से मुनिराज थे जो अपने भावलिंगी होने का प्रमाणपत्र लेकर चलते थे? क्या किसी के पास में सम्प्रति काल में भावलिंगी संतों की परम्परा में अवरोध दर्शाने वाला कोई प्रमाण है? अगर है तो महानुभाव हमें अवश्य इंगित करायें। मात्र शंका करना ही किसी की विद्वता का प्रमाणीकरण नहीं हो सकता। असंतुष्टि हेतु विशद कारण भी तो होना चाहिये। क्योंकि शंका तो सम्यक्त्व का दोष है और मिथ्यादृष्टि को विद्वान कहा तो जा सकता है किन्तु मिथ्यादृष्टि विद्वान हो नहीं सकता, कारण हीन शंका एक कोरा दंभ मात्र है।

श्री मद् आचार्य देव कुन्दकुन्द स्वामी भावलिंगी का निरूपण करते हुये कहते हैं -

देहादिसंग रहिओ माणकसाएहिं सयल परिचत्तो।
अप्पा   अप्पम्मि   रओ  स भावलिंगी  हवे  साहू।। (अ.पा./5-56/भा.प्रा.)
देहादि संग रहित मानकषायैः सकल परित्यक्तः ।
आत्मा आत्मनि रतः स भावलिंङ्गी भवेत साधुः।। (अ.पा. संस्कृत टीका-श्रुतसागरसूरि)
           अर्थात् जो शरीर आदि परिग्रह से रहित है मान कषाय से पूर्णतया निर्मुक्त है तथा जिसकी आत्मा आत्मस्वरूप में लीन है वह साधू भावलिंगी होता है। खेत, मकान, धन-धान्य, द्विपद दासी दास चतुष्पद पशु, चाँदी, स्वर्ण, वस्त्र तथा बर्तन ये 10 बाह्य परिग्रह हैं तथा मिथ्यात्व, वेद, हास्यादि नोकषाय चार कषाय राग, द्वेष ये 14 अंतरंग परिग्रह है। प्रस्तुत गाथा में शरीर से ममता भाव का छोड़ना ही शरीर रूप परिग्रह को त्यागना है, इस तरह आचार्य भगवन कुंदकुंद देव के कथनानुसार एवं अष्टपाहुड़ की संस्कृत टीका करने वाले महान आचार्य श्री श्रुतसागर जी महामुनिराज "भावलिंग" की व्याख्या कर रहे हैं। और आजकल के कतिपय विद्वान "भावलिंगी" को आगम सम्मत नहीं मानते तो भला ये बताइये कि वो विद्वान प्रमाणिक है या हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा सृजित आर्ष आगम प्रमाण माना जाना चाहिये ?
           जैनदर्शन में कहा गया है कि जब वक्ता प्रमाणित हो तभी वाक्य प्रमाणित होते हैं वाक्य की प्रमाणिकता के साथ वक्ता की प्रमाणिकता भी यथायोग्य अनिवार्य है। अत: बड़ी-बड़ी गोष्ठी में लच्छेदार वक्तव्य बोलने वाले विद्वतजनों से हमारा निवेदन है कि पूर्वोक्त आगम में संदेहास्पद कथन कर अपनी विद्वत्ता पर संदिग्धता ना जताये क्योंकि एक विद्वान अनेक विद्वानों का जनक होता है, विद्वान समाज का दर्पण होता है और विकृत दर्पण स्पष्टता को प्रतिबिम्बित करे यह कोई आवश्यक नहीं। इतिहास प्रमाण है कि अप्रतिष्ठित लोगों से संस्कृति का इतना विनाश नहीं हुआ जितना किसी प्रतिष्ठित विद्वान ने समाज तथा संस्कृति को आघात पहुँचाया है| आहत होती संस्कृति तथा समाज इन मूर्धन्य धूर्ती को आजीवन माफ नहीं कर पायेंगी।
             अतएव किसी भी पंथवाद-संतवाद में ना पड़कर थोड़ा-सा समाज धर्म तथा आगम पर निष्प्रभाव से समर्पण रखकर यथार्थता को स्वीकारें, सत्य को जानना और सत्य को मानना अनिवार्य है अन्यथा ये सिद्धांत मात्र कागजों में छपे कोरे शब्दों से अंकित पुलिदे मात्र रह जायेंगे। एक ओर तो हम और आप इन मुनिराजों को धरती के देवता, जैनत्व का सौंदर्य तथा चलते-फिरते सिद्ध मानते हैं, कहते हैं, और पंथ परंपरा तथा संतवाद के राग-द्वेष में पड़कर इन्हें असिद्ध घोषित करने में समृचा सिद्धांत झुटला देते हैं अब इसे अन्याय ना कहा जाये तो और क्या कहा जा सकता है। मान्यवर सुधारें अपनी दृष्टि को, सुधारें आगम को यही श्रेयसकारी है।
          अगर अब भी शंका है, संदेह है तो निश्चित ही हम कहीं न कहाँ गलत है और अपनी गलती पर हठधर्मिता करने की भूल कर रहे है हैं। नहीं मानना हमारा अपना विषय है इसे किसी पर थोपना अनुचित है और अमानवीय भी। एक वो जीव है जिन्हें साधू के निर्दोष मुद्रा पर कहे गये प्रभावी विद्वान आचार्य भगवन्त श्री कुन्दकुन्द देव के कथन पर शंका हो रही है, वहीं एक पूर्वाचार्य हैं जिन्हें इस वीतराग मुद्रा में भगवान के दर्शन होते हैं जो इन्हें भगवान मानते हैं। दृष्टि व श्रद्धान की ही भिन्नता है, नहीं तो सिद्धान्त तो शाश्वत ही होता है। जो शाश्वत मानता है वही ज्ञानी है, विरोध की विसंगति पर श्रद्धान प्रदर्शित करने वालों को देखकर याद आती है किसी विद्वान को ये पंक्तियाँ-
"माली ने तो साजिस कर ली है सूनी हो चमन की हर डाली।
फूलों की हिफाजत करने को, काँटों ने बढ़कर काम किया।।"
        कोई भी जीव भावलिंगत्व पर शंका तो कर सकता है किन्तु आचार्य वट्टेकर स्वामी की लेखनी से प्रसूत महान सिद्धान्त को दवा नहीं सकता। वह मूलाचार का स्वर हजारों-हजार मिथ्या उपत्यकाओं को ध्वस्त करता हुआ कहेगा-
भिक्खं वक्कं हिययं साधिय जो चरदि णिच्च सो साहू।
एसो   सुविद्   साहू   भणिओ  जिणसासणे   भयवं ।।
        अर्थात् जो साधू मन वचन काय का शोधन करके नित्य ही आचरण करता है। तथा आहार की गृद्धि नहीं करता, वह साधू जिन शासन का भगवान है।
        महानुभाव मैं कहता हूँ आप मत मानिये भगवान। आपके ना मानने से भगवान की भगवत्ता समाप्त नहीं हो सकती। एक साधारण से पदाधिकारी के पद को ना मानें तो भी ना मानने से किसी की पदोचित शक्तियों से उसे प्रथक नहीं किया जा सकता। हम और आप किसी के गुणों तथा योग्यता को समाप्त नहीं कर सकते। इसलिये जिन्हें अपनी भवाभिनंदिता को न्यूनता देनी हैं तो भावाभिनंदी भावलिंगी श्रमणों की शरण में आइये। यही शरण कल्याणकारी होगी।
अंत मे भावना हैं उन भवाभिनंदियों के प्रति कि आपके  अशुभ कर्मों का इतना क्षयोपशम हो की आप आपसी राग-द्वेष को दूर कर सके और संतवाद-पंथवाद-जातिवाद की दीवारों से परे श्रमणों का सच्चा श्रमणत्व आप सभी देख सके| भावलिंगी का भावलिंग देख सके|
जय जिनेन्द्र.......जय विमर्श.........!!!!!!!!!