चींटियों का उपसर्ग

चींटियों का उपसर्ग

चींटियों का उपसर्ग

Posted On: 05-August-2022

बात उस समय की है जब पूज्य गुरुदेव का शिक्षा काल सानंद सुचारू चल रहा था। प.पू. आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के शुभाशीष से दो मुनिराजो का संघ जिनधर्म की प्रभावना हेतु विहार कर रहा था। हीरो की नगरी पन्ना के समीपस्थ ग्राम में दोनों मुनिराज संध्या की बेला में विहार करते हुए पहुंचे।ग्राम में कोई जैन श्रावक ना था।अतः ग्राम वालों ने दो तखत लाकर दोनों मुनियों से बैठना का निवेदन किया । समता भावी मुनिराज काष्ठासन पर विराजमान हो गये।
रात्रि काल में पन्ना से कुछ श्रावक श्रेष्ठी जन आए और देसी घी से दोनों मुनिराजो की वैयावृत्ती की। पश्चात् कनिष्ठ मुनिराज का तो वस्त्र से घी पोंछ दिया परन्तु ज्येष्ठ मुनि श्री 108 विमर्श सागर जी गुरुदेव के शरीर में लगा घी पोछना भूल गए। रात्रि ढलती गई और अचानक पूज्य गुरुदेव की निद्रा टूटी और उन्हें एहसास हुआ कि उनके शरीर पर कुछ रेंग रहा है।।
हाँ। गुरुदेव के शरीर पर सैकड़ों चीटियां रेंग रही थी । गुरुदेव सावधानी पूर्वक समिति पालन करते हुए उठकर बैठ गए। ताकि किसी एक चींटी की भी विराधना न हो पाये, धन्य हैं निर्ग्रंथ मुनिराज और धन्य है इन मुनिराजों की जीवमात्र के प्रति करुणा का भाव|  
आम जन के शरीर पर यदि एक चीटी भी चलने लग जाये तो वह बेचैन होने लग जाता है, किन्तु पूज्य गुरुदेव उस रात चीटियों का प्रतिकार किए बिना ही अपने समता स्वभाव में स्थिर रहे और रात भर अपनी आत्मा में ही ध्यान मग्न रहे। 
जब समीपस्थ मुनिराज प्रातः कालीन सामायिक  से निर्वृत हुए तो उन्होंने देखा कि श्रमण श्री विमर्श सागर जी के पुरे शरीर पर हजारों चीटियाँ चढ़ी हुयी हैं और गुरुवर ध्यानमग्न हैं, उन्होंने सावधानी पूर्वक सभी चीटियों को पिच्छिका से दूर किया| उपसर्ग दूर हुआ जानकर प. पूज्य गुरुदेव ने अपने नेत्र खोले|
यही तो है भावलिंगी संत की पहचान
"अप्पा अप्पमि रऔ" जिनकी आत्मा , आत्मा में ही निवास करती है। ऐसे वर्तमान के भावलिंगी संत के चरणों में हमारा कोटि-कोटि नमन| 


Jinagam panth prabhavna samiti