दर्शन अंतराय

दर्शन अंतराय

दर्शन अंतराय

Posted On: 05-August-2022

पूज्य पुरुषों की हर एक क्रिया सामान्य जनों के लिए आदर्श का पथ प्रस्तुत करती है उनकी हर चर्या अपने आप में एक शिक्षाप्रद उदाहरण होती है।
       प. पूज्य गुरुदेव खरगापुर कस्बे में ग्रीष्मकालीन वाचना कर रहे थे। एक दिन प्रभात की बेला में पूज्य गुरूदेव अपने संघ सहित जिनदर्शन हेतु जिनालय में गये, भगवान के दर्शन हेतु अनेक श्रावक वेदिका के सन्मुख पूर्व से ही खड़े हुए थे, गुरुदेव के संघस्थ एक ब्रह्मचारी भैया जी तुरंत फुर्ती दिखाते हुए आगे की ओर आये और उन सबको को आगे से हटने के लिए संकेत करने लगे, तब पूज्य गुरुदेव ने तुरंत भैया जी को ऐसा करने से रोक दिया और चुपचाप श्रावकों के पीछे से ही दर्शन करके वापिस वसतिका में आ गये।

फिर भैया जी को समझाया कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए- "मैं जब भी दर्शन हेतु मंदिर जाता हूँ तो आचार्य बनकर नहीं भक्त बनकर जाता हूँ और जो भी वहाँ दर्शन करने उपस्थित होते हैं वह भी भगवान के भक्त ही हैं, एक भक्त को दूसरे की भक्ति में अंतराय नहीं डालना चाहिये। मैं किसी के धर्म ध्यान में अंतराय कारण नहीं बनना चाहता।"

भैया जी ने दोनों हाथ जोड़ लिये और बोले आगे से गलती नहीं होगी गुरूदेव।
सच ही तो है जिनके दर्शन से सभी के अंतराय कर्म क्षय  को प्राप्त हो जाते हैं वह क्या कभी किसी के लिए अंतराय का कारण बन सकते हैं, कभी नहीं !


Jinagam panth prabhavna samiti